‘एनकाउंटर या वैधानिक हत्या? जब रक्षक से ही “शूटर” बनने की मांग करने लगे जनता’; खाकी की खामोशी और “ऑन द स्पॉट जस्टिस” के बीच दम तोड़ती न्यायपालिका!
विशेष विश्लेषण: क्या पुलिस अब 'भाड़े की शूटर' बन गई है? मथुरा से लेकर मिर्ज़ापुर तक, अपराधी को 'ठोक देने' की सरेआम मांग और पुलिस की खामोशी। 'वैधानिक हत्या' बनाम एनकाउंटर के बीच पिसता कानून का इक़बाल। PNN24 की एक कड़वी मगर सच्ची रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
PNN24 News: एक दौर था जब ‘एनकाउंटर’ शब्द का अर्थ पुलिस की बहादुरी और आमने-सामने की मुठभेड़ से होता था। जांबाज पुलिसकर्मियों को ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के तमगे मिलते थे और आउट ऑफ टर्म प्रमोशन उनका गौरव बढ़ाते थे। लेकिन वक्त बदलते देर नहीं लगती। आज उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में एनकाउंटर की बढ़ती संख्या और उन पर उठते सवालों ने इसे ‘वैधानिक हत्या’ की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है।
1. जनता की मांग पर ‘ऑन द स्पॉट जस्टिस’
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि अब जनता किसी अपराधी की गिरफ्तारी या सजा नहीं, बल्कि सीधे ‘एनकाउंटर’ की मांग करने लगी है। चाहे मथुरा में सड़क जाम कर रहे लोग हों या यूपी कॉलेज में छात्र की हत्या के बाद आक्रोशित भीड़—नारा एक ही है: “एनकाउंटर करो”।
- खतरनाक संकेत: जनता का यह भरोसा कि “पुलिस फर्जी मार देती है”, कानून के राज के लिए सबसे बड़ा खतरा है। लोग अब पुलिस को कानून का रखवाला कम और एक ‘शूटर’ के तौर पर ज्यादा देखने लगे हैं।
2. जब जनप्रतिनिधि देने लगे ‘सुपारी’
हाल ही में मिर्ज़ापुर का ‘अब्दुल’ वाला मामला इसका सटीक उदाहरण है। एक पुराने विवाद को सांप्रदायिक रंग देकर थाने का घेराव हुआ। वहाँ खड़े एक कद्दावर भाजपा नेता ने भगवा गमछा लहराते हुए भीड़ से कहा— “पुलिस से बात हो गई है, बुल्डोजर भी चलेगा और एनकाउंटर भी होगा।” * अधिकारियों की चुप्पी: विडंबना देखिए, पास खड़े पुलिस कप्तान (SP) ने एक बार भी नेताजी को यह नहीं टोका कि “हम पुलिस वाले हैं, कोई भाड़े के शूटर नहीं जिसे आप ठोक देने की सुपारी दे रहे हैं।”
3. चयनात्मक न्याय और सामाजिक पतन
देखा गया है कि ‘एनकाउंटर’ की मांग तब और तेज हो जाती है जब आरोपी किसी विशेष समुदाय (खासकर मुस्लिम समाज) से हो। ऐसे में पुलिस भी कभी-कभी ‘जनता की मांग’ को आंशिक या पूर्ण रूप से पूरा कर देती है।
- न अदालत, न दलील: जब सड़क पर ही न्याय तय होने लगे, तो फिर अदालतों, जिरह और सबूतों की क्या जरूरत? यह ‘जस्टिस ऑन स्पॉट’ की चाहत समाज को किस निचले स्तर पर ले जा रही है, यह सोचने का विषय है।
4. खाकी का गिरता इकबाल
आज के दौर में अधिकारियों के पास शायद वह ‘जिगर’ नहीं बचा कि वे गलत मांग का विरोध कर सकें। सब नौकरी बचाने में लगे हैं। लेकिन सवाल उन पुलिसकर्मियों से भी है जो इसी समाज का हिस्सा हैं—क्या आप अपने बच्चों को एक ऐसा समाज देना चाहते हैं जहाँ पुलिस का काम केवल गोली मारना रह जाए?
📊 एनकाउंटर संस्कृति: एक कड़वा विश्लेषण (Critical Analysis)
| पहलू | पहले की स्थिति | वर्तमान स्थिति (2026) |
| परिभाषा | आत्मरक्षा में की गई मुठभेड़ | जनता की मांग पर ‘वैधानिक हत्या’ |
| प्रक्रिया | लंबी कानूनी लड़ाई और गिरफ्तारी | ‘ऑन द स्पॉट’ फैसला |
| पुलिस की छवि | कानून के रक्षक | ‘शूटर’ या ‘एग्जीक्यूशनर’ |
| न्यायपालिका | सजा देने का अंतिम अधिकार | भीड़ तंत्र के आगे बौनी होती व्यवस्था |
📌 PNN24 का नज़रिया:
सच कड़वा है साहब! जब कानून के रखवाले से जनता कानून तोड़ने को कहे और अधिकारी मुस्कुराकर उसे स्वीकार कर लें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और न्याय की नींव हिल चुकी है। समाज को उस ‘मुफ्त न्याय’ की ज़रूरत नहीं जो किसी की जान लेकर मिलता हो, बल्कि उस व्यवस्था की ज़रूरत है जहाँ अपराधी कानून के फंदे से न बच सके। पुलिस को ‘शूटर’ समझना बंद कीजिए, वरना कल को यह बंदूक किसी बेगुनाह की ओर भी मुड़ सकती है।












