‘हाईकोर्ट की NHRC को फटकार: “जहाँ लिंचिंग होती है वहां आयोग मौन, यहाँ दखल की क्या ज़रूरत?, मुसलमानों से जुड़े मामलो को नज़रअंदाज़ कर रहा NHRC”; जस्टिस अतुल श्रीधरन ने मानवाधिकार आयोग की प्राथमिकताओं पर उठाए सवाल!’
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने NHRC की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल। 'लिंचिंग' जैसे मुद्दों पर चुप्पी और प्रशासनिक मामलों में दखल को लेकर की कड़ी टिप्पणी। यूपी के 588 मदरसों की जांच से जुड़ा है मामला। 11 मई को होगी अगली सुनवाई। PNN24 की विशेष कानूनी रिपोर्ट।

तारिक खान
प्रयागराज (PNN24 News): इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की भूमिका और उसकी प्राथमिकताओं पर अत्यंत कड़ी टिप्पणी की है। जस्टिस अतुल श्रीधरन ने अपने लिखित आदेश में आयोग को आईना दिखाते हुए कहा कि मानवाधिकार आयोग उन मामलों में दखल देने की कोशिश कर रहा है जो वास्तव में अदालती क्षेत्र के हैं।
1. लिंचिंग और जांच पर आयोग की “चुप्पी” पर सवाल
जस्टिस श्रीधरन ने अपने आदेश में बेहद संवेदनशील टिप्पणी करते हुए लिखा कि:
- देश में ऐसे कई मामले होते हैं जहाँ मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले होते हैं या उनकी हत्या (लिंचिंग) तक कर दी जाती है।
- ऐसे गंभीर मामलों में अक्सर आरोपियों के खिलाफ न तो ठीक से केस दर्ज होता है और न ही जांच सही तरीके से की जाती है।
- आयोग इन गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में खुद से संज्ञान लेने के बजाय उन मुद्दों में पड़ता दिखता है जो पहली नज़र में उससे जुड़े ही नहीं होते।
2. क्या है पूरा मामला? (मदरसा जांच विवाद)
यह पूरा विवाद उत्तर प्रदेश के 588 मदरसों को मिल रहे सरकारी अनुदान से जुड़ा है:
- शिकायत: फरवरी 2025 में NHRC को शिकायत मिली कि ये मदरसे मानकों (अच्छी इमारत, योग्य शिक्षक) को पूरा नहीं कर रहे हैं।
- आरोप: यह भी आरोप लगाया गया कि शिक्षकों की नियुक्ति रिश्वत के जरिए हो रही है और इसमें अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारी शामिल हैं।
- आदेश: NHRC ने यूपी की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) को इन आरोपों की जांच कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था।
- चुनौती: इसी आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि पहली नज़र में इसमें मानवाधिकार का कोई मुद्दा नहीं दिखता।
3. बेंच में मतभेद और अगली सुनवाई
सुनवाई के दौरान बेंच के दो जजों के बीच टिप्पणियों को लेकर असहमति भी दिखी:
- जस्टिस अतुल श्रीधरन ने जहाँ आयोग की आलोचना की, वहीं उनके साथी जज जस्टिस विवेक सारन ने इन टिप्पणियों से असहमति जताई।
- जस्टिस सारन का तर्क था कि आयोग का कोई पक्ष वहां मौजूद नहीं था, इसलिए ऐसी टिप्पणी नहीं होनी चाहिए।
- हालांकि, दोनों जज सुनवाई टालने पर सहमत हुए और अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 मई को होगी।
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