‘सियासत अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह: अपना ही पुतला फूंकते वक्त झुलसीं BJP विधायक का हाल जानने अस्पताल पहुँचे अखिलेश यादव; विरोधी भी हुए मुरीद!’
सियासत से बड़ी इंसानियत! अपना ही पुतला फूंकते वक्त झुलसीं भाजपा विधायक अनुपमा जायसवाल का हाल जानने अस्पताल पहुँचे अखिलेश यादव। विरोध और वैचारिक मतभेद के बीच 'मानवीय मूल्यों' की मिसाल पेश करती यह तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र। PNN24 की विशेष राजनैतिक रिपोर्ट।

आफताब फारुकी संग तारिक आज़मी की मोरबतिया
लखनऊ (PNN24 News): उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर तीखी बयानबाजी और कड़े विरोध प्रदर्शन देखने को मिलते हैं, लेकिन हाल ही में एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने राजनैतिक कटुता के बीच मानवीय मूल्यों की एक नई लकीर खींच दी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बहराइच से भाजपा विधायक अनुपमा जायसवाल के अस्पताल पहुँचकर उनका कुशल-क्षेम पूछा।
1. पुतला दहन के दौरान हुआ था हादसा
गौरतलब है कि पिछले दिनों भाजपा विधायक अनुपमा जायसवाल पार्टी के एक विरोध प्रदर्शन के दौरान अखिलेश यादव का पुतला फूंक रही थीं। इसी प्रक्रिया के दौरान आग की लपटों की चपेट में आने से वह गंभीर रूप से झुलस गईं। उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनका उपचार चल रहा है।
2. “विरोध” के ऊपर “विवेकाधीन” व्यवहार
हैरानी और प्रशंसा की बात यह है कि जिस नेता का पुतला जलाते वक्त विधायक घायल हुईं, वही नेता (अखिलेश यादव) अपनी राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता को किनारे रखकर मानवीय आधार पर उनसे मिलने अस्पताल जा पहुँचे। तस्वीर में दोनों नेताओं के बीच शिष्टाचार और सौहार्द साफ़ दिखाई दे रहा है।
3. सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय
यह तस्वीर वायरल होने के बाद लोग इसे ‘लोकतंत्र की खूबसूरती’ बता रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब सियासत में व्यक्तिगत हमले और नफरत बढ़ती जा रही है, ऐसे में अखिलेश यादव का यह कदम राजनैतिक शुचिता की मिसाल है।
📝 विशेष कॉलम: मोरबत्तियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

काका का नज़रिया: “बबुआ, पुतला तो कागज और घास का बना होता है जो जलकर राख हो जाता है, पर जो ‘इंसानियत’ की लौ जलती रहनी चाहिए, वो इस तस्वीर में साफ़ दिख रही है!”
आज अखिलेश यादव और अनुपमा जायसवाल की इस मुलाकात पर अस्सी घाट की अड़ी पर काका ने बड़े ही गहरे शब्दों में टिप्पणी की।
काका बोले: “बबुआ, सियासत का दस्तूर बड़ा अजीब है। कल तक जो हाथ पुतला फूंक रहे थे, आज उन्हीं हाथों का हाल जानने वो शख्स खुद पहुँच गया जिसका पुतला फूँका गया था। ई तस्वीर उन लोगों के मुँह पर तमाचा है जो राजनीति को ‘दुश्मनी’ समझ लेते हैं। अनुपमा जी भाजपा की शेरनी हैं और अखिलेश जी विपक्ष के बड़े नेता, पर अस्पताल के कमरे में दोनों सिर्फ दो ‘इंसान’ थे।”
मैंने पूछा— “काका, क्या ऐसी तस्वीरों से ज़मीनी कार्यकर्ताओं की नफरत कम होगी?”
काका का जवाब: “होनी तो चाहिए बबुआ! जब सेनापति हाथ मिला रहे हों, तो प्यादों को तलवारें म्यान में रख लेनी चाहिए। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, विचारधारा अलग हो सकती है, पर संस्कार एक होने चाहिए’। अखिलेश जी का अस्पताल जाना बताता है कि वो बड़े दिल के खिलाड़ी हैं। अब देखना ई है कि जनता इसे किस नज़रिए से देखती है।”
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