‘लोहता में “मदरसा माफिया” (मदरसा रज़ा-ए-मुस्तफा) का महाघोटाला: मतीन प्रधान के कुनबे ने सरकारी खजाने में लगाई “सेंध”; घर के 5 लोग बने कागजी शिक्षक, 48 लाख सालाना की लूट; अनपढ़ों को थमा दी 80 हज़ारी तनख्वाह!’

वाराणसी विशेष: लोहता का मदरसा रज़ा-ए-मुस्तफा बना मैनेजर मतीन प्रधान की 'निजी जागीर'! एक ही परिवार के 5 सदस्य बने सरकारी शिक्षक, हर महीने 4 लाख रुपये के वारे-न्यारे। फर्जी डिग्री के सहारे 80 हजार की तनख्वाह डकारने का आरोप। क्या अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की मिलीभगत से फल-फूल रहा है यह मदरसा माफिया? PNN24 की विशेष पड़ताल।

तारिक आज़मी

वाराणसी (PNN24 News): वाराणसी के लोहता क्षेत्र में शिक्षा के पवित्र मंदिर ‘मदरसों’ को कुछ रसूखदारों ने अपनी अवैध कमाई का अड्डा बना लिया है। मदरसा रज़ा-ए-मुस्तफा के मैनेजर मतीन प्रधान पर सरकारी सुविधाओं के घोर दुरुपयोग और करोड़ों के गबन का सनसनीखेज आरोप लगा है। ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे के बीच यहाँ ‘अपनों का विकास’ धड़ल्ले से चल रहा है।

1. ‘पारिवारिक’ पाठशाला: 5 सदस्य, 4 लाख की मासिक मलाई

मतीन प्रधान ने मदरसे को अपनी ‘जेब की खेती’ बना रखा है।

  • भ्रष्टाचार का मॉडल: मदरसे में नियुक्त शिक्षकों में से 5 सदस्य खुद मतीन प्रधान के परिवार के हैं।
  • आराम तलबी: ये ‘खास’ शिक्षक स्कूल जाने के बजाय घर पर आराम फरमाते हैं, जबकि उनकी जगह 3-4 हज़ार रुपये के अल्प वेतन पर बेरोजगार युवक-युवतियों से पढ़वाया जा रहा है।
  • गणित: यदि इनके परिवार के 5 शिक्षकों की औसत तनख्वाह जोड़ी जाए, तो लगभग 4 लाख रुपये महीना और 48 लाख रुपये सालाना सरकारी धन सीधे मतीन प्रधान के घर जा रहा है।

2. हाफ़िज़ अंसार: 5वीं पास और 80 हज़ार की तनख्वाह?

मदरसे के एक शिक्षक हाफ़िज़ अंसार की कहानी और भी चौंकाने वाली है।

  • फर्जीवाड़ा: सूत्रों का दावा है कि अंसार ने केवल कक्षा 5 तक पढ़ाई की है, लेकिन फर्जी उर्दू डिग्री के सहारे वे आज 80,000 रुपये प्रति माह की सरकारी तनख्वाह पा रहे हैं। उन्हें न हिंदी पढ़नी आती है और न लिखनी, फिर भी वे ‘शिक्षक’ बने बैठे हैं।

3. छात्र संख्या में हेराफेरी और बाहरी नियुक्तियां

मतीन प्रधान के घोटालों की लिस्ट लंबी है:

  • कागजी छात्र: सरकारी रिकॉर्ड में जितने छात्र पंजीकृत दिखाए जाते हैं, हकीकत में उसके महज 20 प्रतिशत ही उपस्थित रहते हैं।
  • नियुक्ति घोटाला: अन्य प्रदेशों के अखबारों में गुपचुप विज्ञापन निकलवाकर मोटी घूस लेकर नियुक्तियां की गईं, जिनमें से अधिकतर की डिग्रियां संदिग्ध हैं।

4. अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी पर सवाल

इतने बड़े पैमाने पर चल रहे भ्रष्टाचार पर ज़िला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या विभाग के अधिकारियों को इस लूट में उनका ‘हिस्सा’ समय पर मिल रहा है? पूर्वांचल के दो बड़े ‘मदरसा माफिया किंग’ जो अर्दली बाज़ार क्षेत्र के निवासी हैं (एक कांग्रेस और एक सपा से जुड़े), उनके संरक्षण में यह खेल फल-फूल रहा है।


📝 काका का लट्ठ लेकर जबरी वाला जज़रिया:

काका को मेरी हर के खबर पर अब नजरिया देने का जो चस्का लगा है, उसके लिए सर सलामत रखने के लिए मुझे उनका नजरिया लेना पड़ता है, आज रात लोहता के इस मदरसा घोटाले पर  काका ने जम कर भड़ास निकाली। काका ने साफ़ साफ़ कहा कि “बबुआ, जब ‘प्रधान’ ही ‘पायजामे’ से बाहर निकलकर सरकारी तिजोरी पर हाथ साफ़ करने लगे, तो गरीब के बच्चे का भविष्य तो ‘अंधेरे’ में ही रहेगा!”

काका बोले: “बबुआ, मतीन प्रधान ने तो कमाल कर दिया। पूरा कुनबा ही मास्टर बन गया! 5वीं पास आदमी 80 हज़ार की तनख्वाह पा रहा है और जो बेचारे पढ़-लिखकर सड़क नाप रहे हैं, उन्हें 4 हज़ार में खटाया जा रहा है। ई मदरसा है या मतीन प्रधान की ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’? सरकारी पैसा लूटने के लिए विज्ञापन भी दूसरे प्रदेशों में छपवाते हैं ताकि यहाँ के किसी नौजवान को कानो-कान खबर न हो।”

मैंने पूछा— “काका, क्या इन माफियाओं पर कभी कार्रवाई होगी?”

काका का जवाब: “होगी बबुआ, जब ऊपर से हंटर चलेगा। अर्दली बाज़ार वाले ‘बड़ों’ का नाम भी जल्द सामने आएगा। लोहता का एक और मैनेजर है जो कल तक साइकिल से चलता था और आज ‘अरबपति’ बन बैठा है। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, जाँच ऐसी बिठाइये कि इन कागजी मास्टरों के प्रमाणपत्रों की स्याही भी शर्म से पानी-पानी हो जाए’। PNN24 की कलम अब रुकने वाली नहीं है।”

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