‘पलिया के “आम” बागों में चिंता की “खास” लहर: लहलहाते बौर के बीच आंधी का खौफ; कर्ज और कुदरत की मार के बीच पिस रहे अन्नदाता, क्या सरकार सुनेगी गुहार?’
पलिया (खीरी): आम के बागों में 'बौर' भरपूर, पर बागवानों के दिल में 'डर' का साया। बदलते मौसम और आंधी-तूफान की आशंका ने उड़ाई किसानों की नींद। लागत निकालना हुआ दूभर, घट रहा है बागों का रकबा। अफसर अली, जसकरण सिंह और राजेंद्र राठौर ने बयां किया अपना दर्द। PNN24 की विशेष ग्रामीण रिपोर्ट।

फारुख हुसैन
पलिया कलां, लखीमपुर खीरी (PNN24 News): तराई की उपजाऊ मिट्टी और आम के बागों के लिए मशहूर पलिया क्षेत्र में इस बार पेड़ों पर बौर तो भरपूर नजर आ रहा है, लेकिन बागवानों के चेहरों पर मुस्कान की जगह चिंता की लकीरें हैं। बीते कुछ वर्षों के कड़वे अनुभवों और मौसम के बदलते मिजाज ने किसानों के मन में एक अनजाना डर बैठा दिया है। साल भर पसीना बहाने और हजारों की लागत लगाने के बाद अब किसानों को डर है कि कहीं कुदरत का एक कहर उनकी मेहनत को मिट्टी में न मिला दे।
1. लागत बढ़ी, मुनाफा घटा
किसानों का कहना है कि अब बागवानी मुनाफे का सौदा नहीं रह गई है। सिंचाई, जुताई, खाद और कीटनाशकों के दाम आसमान छू रहे हैं। पलिया के किसान अफसर अली अपनी व्यथा साझा करते हुए कहते हैं— “हम लोग साल भर पाई-पाई जोड़कर बागों में लगाते हैं। कीटनाशकों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि लागत निकालना भी दूभर है। मौसम की एक मार हमारी पूरी मेहनत को मिट्टी में मिला देती है।”
2. बिगड़ता पर्यावरण और घटता रकबा
तेजी से हो रही बागों की कटाई और बढ़ते शहरीकरण ने पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ दिया है। स्थानीय किसान जसकरण सिंह बताते हैं— “क्षेत्र में पहले की तुलना में बाग बहुत कम रह गए हैं। पेड़ों की संख्या घटने से मौसम का चक्र भी बिगड़ गया है। अब न समय पर फूल टिकते हैं और न ही फल। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।”
3. बीमा और अनुदान की मांग
बागबान राजेंद्र राठौर का मानना है कि आम की पैदावार अब पूरी तरह मौसम के रहमोकरम पर टिकी है। वे कहते हैं— “अगर तेज हवा चली तो सारा बौर जमीन पर होता है। हम चाहते हैं कि सरकार हमें राहत पहुँचाने के लिए कोई विशेष बीमा या अनुदान योजना लागू करे, ताकि प्राकृतिक आपदा की स्थिति में हमें भीख न मांगनी पड़े।”
📊 बागवानी संकट: मुख्य चुनौतियां (Farmer’s Challenges)
| समस्या | कारण | असर |
| प्राकृतिक आपदा | असमय आंधी और तूफान | बौर का गिरना, शून्य पैदावार |
| बढ़ती लागत | खाद और कीटनाशकों के दाम | लागत निकालना मुश्किल |
| पर्यावरण | बागों का कटान और शहरीकरण | मौसम चक्र का बिगड़ना |
| सरकारी मदद | विशेष बीमा योजना का अभाव | नुकसान की भरपाई न होना |














