‘वाराणसी पुलिस का “छपास रोग”: दरोगा जी का पीआर (PR) संभाल रहे झोलाछाप पत्रकार; मह्मूरगंज चौकी के चंद कदम दूर “सालसा कैफे” में सज रही अय्याशी की महफिल; स्पेशल कोड वर्ड से खुलता है सीक्रेट दरवाज़ा!’
वाराणसी पुलिस का 'छपास रोग' और रसूखदारों का 'सालसा कैफे'! मह्मूरगंज चौकी के पास नशे और अय्याशी का अड्डा बना कैफे। पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे अधीनस्थ। 800 रुपये में स्पेशल केबिन और छापेमारी से बचने के लिए 'स्पेशल कोड' वाला दरवाज़ा। PNN24 की विशेष खोजी रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): वाराणसी पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल एक तरफ जहाँ कानून का राज कायम करने के लिए कड़े निर्देश दे रहे हैं, वहीं उनके कुछ अधीनस्थ ‘कानून व्यवस्था’ से ज्यादा अपने ‘व्यक्तिगत प्रचार’ (छपास रोग) और ‘अवैध वसूली’ में मस्त हैं। ताज़ा मामला मह्मूरगंज पुलिस चौकी क्षेत्र का है, जहाँ पुलिस की नाक के नीचे नशे और जिस्मफरोशी का काला कारोबार धड़ल्ले से फल-फूल रहा है।
1. दरोगा जी का “छपास रोग” और व्यक्तिगत नर्स
शहर की सीमाओं पर तैनात कुछ दरोगाओं को इन दिनों सोशल मीडिया पर छाने का ऐसा शौक चढ़ा है कि उन्होंने इसके लिए बाकायदा ‘स्थानीय झोलाछाप पत्रकारों’ को अपनी ‘व्यक्तिगत नर्स’ के तौर पर तैनात कर रखा है।
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खेल क्या है? दरोगा जी सड़क पर खड़े होकर ट्रैफिक संभालते हैं, तो तुरंत अपनी ‘नर्स’ को फोन करते हैं। वह नर्स (पत्रकार) मौके पर पहुँचकर 10 फोटो खींचता है और दो लाइन लिख देता है— “फलाने दरोगा जी ने किया तूफानी गश्त”। जब दरोगा जी का पूरा ध्यान अपनी फोटो चमकाने में होगा, तो इलाके में चल रहे अवैध धंधे उन्हें भला क्योंकर दिखाई देंगे?
2. “सालसा कैफे”: मह्मूरगंज पुलिस की ‘वरदहस्त’ का अड्डा?
मह्मूरगंज चौकी इंचार्ज अनुज सिंह और उनके ‘खास’ सिपाही सुनील कुमार के इलाके में किसी गरीब खोमचे वाले की हिम्मत नहीं कि वह कानून तोड़ दे, लेकिन बाहुबली और हिस्ट्रीशीटर सुभास सिंह के भवन में चल रहे “सालसा कैफे” के लिए कानून के मायने अलग हैं।
- स्पेशल केबिन और रेट: सूत्रों के अनुसार, यहाँ 800 रुपये प्रति घंटे की दर से स्पेशल केबिन उपलब्ध हैं, जहाँ ड्रग्स से लेकर कंडोम और सेक्सवर्धक दवाएं तक आसानी से मिल जाती हैं।
- सीक्रेट दरवाज़ा और कोड वर्ड: कैफे के काउंटर के पीछे एक गुप्त दरवाज़ा है जो सीधे भवन स्वामी के घर में खुलता है। यह दरवाज़ा सिर्फ संचालक जिलानी बाबू के एक ‘स्पेशल कोड’ से ही खुलता है। छापेमारी की सूचना मिलते ही सारा आपत्तिजनक सामान इसी रास्ते से गायब कर दिया जाता है।
3. सिपाही सुनील की ‘मुखबिरी’ और एसओजी को चकमा
चर्चा है कि जब भी एसओजी या उच्चाधिकारी छापेमारी का मन बनाते हैं, सिपाही सुनील पहले ही कैफे संचालकों को अलर्ट कर देता है। पूर्व में जब कमिश्नरेट के निर्देश पर सभी अवैध कैफे बंद हुए थे, तब भी ‘सालसा कैफे’ इसी सेटिंग के कारण बच निकला था। जिलानी बाबू को बाहुबली सुभास सिंह और एक अधिवक्ता भाई का संरक्षण प्राप्त है, जिससे ‘सिकंदर’ बने इस संचालक की प्रति सप्ताह की ‘तय रकम’ कथित तौर पर चौकी तक पहुँच जाती है।
📝 काका का नज़रिया:
“बबुआ, आज की पुलिस को ‘अपराधी’ पकड़ने से ज्यादा ‘एंगल’ से फोटो खिंचवाने की चिंता है; जब रक्षक ही ‘नर्स’ पाल ले, तो कानून बीमार होना लाज़मी है!”
आज रात मह्मूरगंज के इस ‘कैफे कल्चर’ और पुलिस की सेटिंग पर अस्सी घाट की अड़ी पर काका ने जमकर खरी-खोटी सुनाई।
काका बोले: “बबुआ, काशी में अब ‘गश्त’ नहीं, ‘शूटिंग’ होती है। दरोगा जी को लगता है कि अखबार में फोटो छप गई तो इलाका शांत हो गया। पर असलियत तो मह्मूरगंज के ‘सालसा कैफे’ में धुआँ उड़ा रही है। 800 रुपये में केबिन और पुलिस की निगरानी में अय्याशी? धन्य है बनारस की पुलिसिंग! सिपाही सुनील जैसे लोग जब तक महकमे में मुखबिरी करेंगे, तब तक ईमानदार अफसरों की कोशिशें बेकार ही रहेंगी।”

काका का जवाब: “बबुआ, कमिश्नर साहब सख्त आदमी हैं, पर उनके नीचे बैठे ‘छपास रोगी’ उनकी साख पर दाग लगा रहे हैं। अब देखना ये है कि जिलानी बाबू का ‘स्पेशल कोड’ काम आता है या पुलिस की लाठी। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, वर्दी की इज़्ज़त फोटो छपवाने में नहीं, बल्कि ऐसे अय्याशी के अड्डों को धूल चटाने में है’।”
📊 रिपोर्ट कार्ड: मह्मूरगंज पुलिस और ‘सालसा कैफे’
| विवरण | हकीकत |
| कैफे का नाम | सालसा कैफे (भवन स्वामी: सुभास सिंह) |
| संचालक | जिलानी बाबू (भेलूपुर निवासी) |
| सुविधाएं | स्पेशल केबिन (800/घंटा), नशीले पदार्थ, अनैतिक गतिविधियां |
| पुलिस की भूमिका | चौकी इंचार्ज की अनदेखी, सिपाही सुनील का कथित संरक्षण |
| जुगाड़ | छापेमारी से पहले ‘कोड वर्ड’ वाला सीक्रेट दरवाज़ा |
नोट: इस मामले में भवन स्वामी सुभाष सिंह का पक्ष हमको प्राप्त नही हो सका है, उनका पक्ष आने पर खबर अपडेट होगी














