गर्भावस्था में मधुमेह’ पर दिया गया प्रशिक्षण, ये करने से दूर होगा गर्भावस्था मधुमेह

संजय ठाकुर

मऊ, 27 जून 2019 – गर्भावस्था में मधुमेह की पहचान एवं प्रबन्धन हेतु  मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय सभागार में आशा और एएनएम को  प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रशिक्षण सीएमओ डॉ सतीशचन्द्र सिंह के नेतृत्व में दिया गया, इस दौरान उन्होने जानकारी दी कि गर्भावस्था में मधुमेह से बचाव के लिए संयमित जीवन शैली जरूरी है। देशभर में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

राज्य स्तरीय प्रशिक्षक डॉ राजेश जैन ने बताया कि सभी गर्भवती महिला की जीडीएम (जस्टेनेशनल डायबिटीज मिलायट्स) की  जांच जरुर कराई जाये। प्रथम जांच 16 सप्ताह के अंदर तथा दूसरी जांच 24 सप्ताह के बाद की  जानी चाहिये। दोनों जाचों के बीच 6 सप्ताह का अंतर होना चाहिये। आशा और एएनएम के प्रयास से गर्भवती महिलाओं को इस बीमारी से लगभग बचाया जा सकता है जो महिलाएं गर्भावस्था में डायबिटीज़ से पीड़ित होती हैं,उनके बच्चे को आगे चलकर टाइप-टू डायबिटीज़ होने की संभावना बनी रहती है। इसलिए इस बीमारी के प्रति जागरूक होना जरूरी है। इससे बचाव के लिए उन्होंने रेशेदार खाद्य पदार्थ खाने की सलाह दी, वहीं तले भुने खाने से परहेज करने की भी सलाह दी। गर्भावस्था में महिला को 30 मिनट प्रतिदिन टहलना चाहिये। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी ही कई बीमारियों की जड़ है।

इस मौके पर एएसीएमओ डॉ एस.पी. अग्रवाल ने बताया कि आज के परिवेश में मधुमेह एक सामान्य बीमारी हो गई है। इससे बचाव के लिये हल्का व्यायाम और सही खानपान लेने से शुरुआत में ही इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। यदि गर्भावस्था में इस बीमारी की अनदेखी की गई तो आगे चलकर मां व बच्चा दोनों को डायबिटीज होने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा कि गर्भधारण करने के 24 वें और 28 वें सप्ताह के बीच डायबिटीज़ की जांच जरूर करानी चाहिए। खाने में महिला को मोटा अनाज, फोलिक एसिड भी दिया जाये।

डीसीपीएम संतोष सिंह ने बताया कि दो दिवसीय प्रसिक्षण सत्र में सभी ब्लाकों के चिकित्साधिकारी, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, लैब टैकनीशियन, फार्मसिस्ट, ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर, स्टाफ़ नर्स, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा प्रतिभाग किया गया।

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