विवादित फिल्म ‘उदयपुर फाइल’ के खिलाफ शहर मुफ़्ती मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने प्रशासन को पत्र लिख कर किया यह मांग, सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी, जमियत ओलमा-ए-हिन्द ने दाखिल किया दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात हाई कोर्ट में याचिका

शफी उस्मानी

वाराणसी: विवादित फिल्म ‘उदयपुर फाइल’ शुक्रवार को रिलीज़ होने के लिए तैयार है। मगर इसके पहले ही यह विरोध और अदालती हस्तक्षेप में घिरी हुई दिखाई दे रही है। इस मामले में जमियत ओलमा-ए-हिन्द ने हाई कोर्ट दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया है। वही सूत्रों के द्वारा मिल रही जानकारी के अनुसार ज्ञानवापी मस्जिद की देख रेख करने वाली संस्था अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने अपना आपत्तिपत्र वाराणसी के जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर को प्रेषित करते हुवे सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का फैसला किया है।

आज अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के सचिव और शहर मुफ़्ती मौलाना बातिन नोमानी ने प्रशासन को पत्र लिखा है। पत्र में लिखा है कि ‘उदयपुर फाइल्स नामक फिल्म जो इसी शुक्रवार दिनांक 11 जुलाई 2025 को रिलीज़ होने जा रही है। इसके ट्रेलर एवं प्रचार सामग्री से यह स्पष्ट होता है कि इसमें कई आपत्तिजनक, भड़काऊ एवं तथ्यहीन बाते दिखाई गई है। जिनसे न केवल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचती है बल्कि यह फिल्म शहर के कानून व्यवस्था एवं समाजिक सौहार्द के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।’

पत्र में मुफ़्ती बातिन नोमानी ने कहा है कि ‘ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर झूठे एवं भड़काऊ दृश्य/ डायलोग प्रस्तुत किये गए है, जो सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले को प्रभावित करने की नीयत से प्रतीत होते है। जिसमे पैगाम्भर हज़रत मुहम्मद स० के सम्बन्ध में भी अत्यंत आपत्तिजनक बाते कही गई है। जी न केवल धार्मिक भावना को भड़काती है, बल्कि 295ए, 153ए जैसी धाराओ के अंतर्गत दंडनीय है। उन्होंने मांग किया है कि यह फिल्म हमारे संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुला उलंघन करती है जिसमे अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) अनुच्छेद 15 (धर्म/नस्ल/जाति/लिंग आदि के आधार पर भेदभाव), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार) का खुला उलंघन है।’

पत्र में कहा गया है कि ‘यह फिल्म सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का भी उलंघन करती है जिसमे कोर्ट ने कहा है कि विचाराधीन मामले में सार्वजनिक भावनाओ को भड़काने वाले प्रचार से बचा जाए। इस शुक्रवार फिल्म की रिलीज़ के दिन जुमा नमाज़ और सावन का पवित्र महीना दोनों एक साथ है, जिससे कानून व्यवस्था प्रभावित होने और सांप्रदायिक तनाव फैलने का गहरा अंदेशा है।’ पत्र में मांग की गई है कि ‘इस फिल्म के प्रदर्शन पर तत्काल रोक लगाई जाए, निर्माता, निर्देशक और प्रदर्शको के विरूद्ध उचित कानूनी कार्यवाई की जाए। जिला प्रशासन द्वारा शहर में विशेष सतर्कता और कानून व्यवस्था बनाये रखने हेतु अग्रिम कदम उठाये जाए। साथ ही स्थानीय सिनेमाघरो को इस फिल्म के प्रदर्शन से रोका जाए ताकि शांति बनी रहे।’ पत्र के अंत में कहा गया है कि ‘हम आशा करते है कि आप उक्त विषय की संवेदनशीलता को समझते हुवे शीघ्र कार्यवाई करेगे, ताकि वाराणसी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी में अमन चुन बना रहे।’

जमियत ओलमा-ए-हिन्द ने किया विभिन्न हाई कोर्ट में वाद दाखिल

‘उदयपुर फाइल्स’ फिल्म की रिलीज़ रोकने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने दिल्ली सहित महाराष्ट्र और गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया है। जमियत ने अपनी याचिका में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग किया है। अदालत में जमियत ओलमा-ए-हिन्द ने कहा है कि फिल्म के ट्रेलर में नुपुर शर्मा का विवादित बयान भी शामिल है, जिससे न केवल देश भर में सांप्रदायिक माहौल खराब हुआ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि भी खराब हुई और दूसरे देशों के साथ हमारे दोस्ताना संबंधों पर भी नकारात्मक असर पड़ा। इसके बाद भाजपा को उसको पार्टी से निकालने पर मजबूर होना पड़ा।

फिल्म का ट्रेलर पैग़म्बर ए इस्लाम और उनकी पवित्र पत्नियों के खिलाफ आपत्तिजनक बातें प्रस्तुत करता है, जिससे देश की शांति और व्यवस्था बिगड़ सकती है। इस फिल्म में देवबंद को उग्रवाद का अड्डा बताया गया है और वहाँ के उलेमा के खिलाफ घोर ज़हरीली भाषा का प्रयोग किया गया है। यह फिल्म पूरी तरह एक धार्मिक समुदाय को बदनाम करती है, जिससे नफ़रत को बढ़ावा मिल सकता है और नागरिकों के बीच आपसी सम्मान व सामाजिक सौहार्द्र को गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। इसमें ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ जैसे लंबित और संवेदनशील मुद्दे का भी उल्लेख किया गया है, जो इस समय वाराणसी की जिला अदालत और सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। यह बातें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं।

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