अलविदा: नहीं रहे बनारस में ‘कदीमी उर्दू के झंडाबरदार’ इमरान उस्मानी, बेनिया स्थित अपने आवास पर लिया इस दुनिया-ए-फानी में आखरी सांस

तारिक आज़मी

वाराणसी: मरहूम मुनव्वर राणा का एक कलाम है ‘हमने भी सवारे है बहुत गेसू-ए-उर्दू, दिल्ली अगर आप है तो बंगाल में हम है’। उर्दू अदब के मर्तबे को ज़ाहिर करता है। इस उर्दू की खिदमत में झंडेबरदारी करने वालो का मकसद सिर्फ इस अदब को बहयात रखना है। ऐसे ही ‘कदीमी उर्दू’ के एक झंडा बरदार इमरान उस्मानी साहब आप इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो गये है।

इमरान उस्मानी कदीमी उर्दू, अरबी और फ़ारसी के एक अच्छे जानकार थे। उनके पास कदीमी दुकानों के ज़खीरे थे। बेशकीमती किताबो के शौक़ीन इमरान उस्मानी साहब हमारे पथप्रदर्शक भी थे और एक अच्छे शायर थे। ‘गर यही मयार-ए-दयानत है तो कल का ताजिर, धुप में बर्फ का बाट लिए बैठा होगा।,’ जैसे अज़ीम अश’आर हमको देने वाले इमरान उस्मानी साहब हमारे खामियों पर ख़ास तवज्जो देकर हमको आगाह करते थे।

बेशक इस दुनिया-ए-फानी से एक दिन सबको रुखसत होना है। ‘मौत का एक दिन मुअ’इन है, नींद रात भर क्यों नहीं आती।’ आज बनारस में एक और ‘कदीमी-उर्दू-अदब’ के झंडाबरदार इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो चुके है। नाती पोतो से भरे पुरे कुनबे को रोता छोड़ इमरान साहब इस दुनिया से रुखसत हो चुके है। हमारे एक खैर’ख्वाह इस दुनिया से रुखसत हो चुके है जिनकी कमी हमको हमेशा महसूस होगी। इमरान उस्मानी साहब के एक पोते शफी उस्मानी पत्रकार है।

इमरान उस्मानी साहब की ‘उर्दू अदब’ वरासत अब उनके बड़े बेटे अबुल खैर उस्मानी ‘मिस्टर’ के कन्धो पर है, जिनको वह बखूबी निभाते भी रहते है। हम अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की बारगाह में इल्तेजा करते है कि अल्लाह मरहूम इमरान उस्मानी की मगफिरत फरमाए और जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम अता फरमाए। अल्लाह उनके वर्सा को सब्र अता करे।

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