कानपुर में क्या दुबारा गर्म हो रहा अपराध का तवा, क्या शानू ओलंगा, रईस बनारसी और मोनू पहाड़ी के दब चुके गैंग को मिल रहा नया लीडर शाहिद पिच्चा

तारिक आज़मी

कानपुर: अपराधियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस की मुहीम कितना रंग लाई है। इसका अंदाज़ा रोज़ के अपराधिक रिकार्ड से आप देख सकते है। शायद ही कोई शहर ऐसा होगा जहा पर आज भी गैंगस्टर बेख़ौफ़ न हो। कभी अपराध जगत का एक बड़ा अड्डा समझा जाने वाला कानपुर शहर बिल्लू गैंग से कापता था। फिर वक्त ने करवट ऐसी मारी कि पूरा गैंग ही तहस नहस हो गया। कुछ पुलिस मुठभेड़ ने ढेर हुवे तो कुछ आपसी गैंगवार के शिकार हुवे।

बिल्लू खत्म हुआ मगर उसका तरीका अपराधियों ने अपना लिया। ये बिल्लू गैंग का तरीका ही था कि एक-दो थाने के मुखबिर से लेकर कुछ पत्रकार तक को अपने संपर्क में रखना। बिल्लू गैंग भले खत्म हुआ था। मगर इस गैंग ने कई ऐसे गैंगस्टर पैदा कर दिया था जो उसी के नक्शेकदम पर चल पड़े। बेशक इनकी अपराध जगत में दौड़ उतनी दूर तक नहीं हो पाई थी, जितनी दूर तक बिल्लू गैंग चला था।

इन गैंगस्टर में कई नाम आये और गए मगर तीन ऐसे नाम थे जो अपने शातिराना चाल से दहशत पैदा कर इस दुनिया से गए। दबदबा नाम का ऐसा कि बड़े बड़े कारोबारी से लेकर आम जनता तक इनके दबदबे के आगे कांपती थी। इनमे शानू ओलंगा, रईस बनारसी और मोनू पहाड़ी गैंग ने जमकर अपराधिक इतिहास बनाये और जमकर रंगदारी और काली कमाई किया। अगर इन तीनो बड़े गैंगस्टर की कार्यशैली देखे तो बिल्लू गैंग के मुखिया बिल्लू बाले से मिलते थे। दरअसल मुखिया को बिल्लू बाले कहा जाता था, मगर बिल्लू और बाले दो अलग अलग व्यक्ति थे और दोनों सगे भाई थे। बिल्लू कुल 7 भाई थे और सभी टॉप लेवल के अपराधी थे।

इनका अपराध जगत में दबदबा कानपुर ही नहीं बल्कि बिहार तक था। इस गैंग में सभी 7 भाई के अलावा शूटर बिहार तक के थे। इस गैंग ने सिर्फ कानपुर पुलिस की ही नहीं बल्कि पुरे उत्तर प्रदेश पुलिस की नींद हराम कर रखा था। इस गैंग को तोड़ने के लिए पुलिस ने हर तरीके अपनाये और अंत में गैंग में पड़ी आपसी फुट ने इस गैंग का खात्मा कर डाला। बिल्लू बाले गैंग ख़त्म हुआ था मगर इस गैंग से जुड़े गुर्गे खुद का अपना गैंग बना बैठे थे। जो एक मल्टीलेवल मार्केटिंग के तरीके से पनपा था। शानू ओलंगा, रईस बनारसी और मोनू पहाड़ी की कड़ी अगर खीचेगे तो इसका अंत भी इसी बिल्लू गैंग से निकलेगा।

बिल्लू बाले अपने गैंग में अपराधियों के साथ साथ थानों के मुखबिरों और कुछ पत्रकारों को भी अपनी लाइन डोरी में रखता था। ये ट्रिक शानू ओलंगा, रईस बनारसी, नौशाद काले, मोनू पहाड़ी ने भी अपनाया। बिल्लू गैंग से अलग हुवे शानू ओलंगा और नौशाद काले शुरू में एक ही थे। मगर बाद में आपसी विवाद के कारण अलग हो गए। नौशाद काले अपराध जगत में अपना नाम बनाना चाहता था और शानू ओलंगा अपना। नौशाद काले का भाई रईस बनारसी काफी समय तक पुलिस के लिए सरदर्द बना रहा। शानू ओलंगा और नौशाद काले ने अलग होने के बाद भी बिल्लू गैंग का वसूल नहीं छोड़ा और थाने के मुखबिरों और एक दो तत्कालीन छुटपुटिया पत्रकारों को अपने साथ जोड़े हुवे थे।

इसी विवाद में शानू ओलंगा ने नौशाद काले की हत्या कर दिया। जिसका बदला लेने के लिए नौशाद के भाई रईस बनारसी ने अपराध जगत में कदम रखा। रईस बनारसी ने बनारस के गुड्डू मामा के साथ मिल कर तत्कालीन सबसे दुस्साहसिक हत्या शानू ओलंगा की किया था। रईस एक शातिर दिमाग का अपराधी था। रईस ने यह हत्याकांड ही केवल दबदबा कायम करने के लिए किया था। कानपुर में आईजी दफ्तर के सामने दिन दहाड़े हुवे इस हत्याकांड ने रईस बनारसी को कानपुर के लिए ‘परदेसी’ बना दिया।

रईस अपने भाई की मौत का बदला लेने के बाद कानपुर का सबसे शातिर और कुख्यात अपराधी बना। इसने भी बिल्लू गैंग की तरफ कुछ पत्रकारों और थाने के मुखबिरों का संरक्षण लिया और लम्बे समय तक पुलिस के लिए सरदर्द बना रहा। वाराणसी में हुवे एक गैंगवार में रईस बनारसी मारा गया। मरने के पूर्व रईस ने अपने दबदबे के बल पर शाहिद पिच्चा और मोनू पहाड़ी को भी अपने गैंग में शामिल कर लिया था।

रईस बनारसी के मारे जाने के बाद उसके सबसे ज्यादा करीबी शरीफ डफाली और सितापुरिया लगभग लावारिस हो गए थे। वैसे रईस के सिर्फ कानपुर में ही गैंग सदस्य नहीं थे बल्कि वाराणसी में दीपक वर्मा जैसे शूटर उसने पाल रखा था। रईस बनारसी के मारे जाने के बाद मोनू पहाड़ी गैंग अकेला बना और फिर जेल में हुई हिंसा के दरमियान मोनू पहाड़ी जेल में ही मारा गया। इन सबके बाद तीनो गैग के अपराधिक साथी लगभग बिना लीडर के हो गये थे। इन सबके बीच एक बड़ा नाम बनकर उभरने लगा शाहिद पिच्चा। शाहिद पिच्चा के साथ उसका जीजा जीशान मोरंग, जीशान का भाई सनी मोरंग थे।

शाहिद पिच्चा ने रईस बनारसी और मोनू पहाड़ी के जीवित रहते ही अपने गैंग का निर्माण चालु कर दिया था। जिसके द्वारा फुरकान हत्याकांड किया गया। फुरकान हत्याकांड में शाहिद पिच्चा, सनी मोरंग और शानू लफ्फाज़ गिरफ्तार हुवे थे। शानू लफ्फाज़ मोरंग का एक बड़ा कारोबारी भी था। इस मामले में सनी की पहले ज़मानत होने के बाद उन्होंने मोरंग का काम शुरू किया और जेल में बंद शानू लफ्फाज़ के कारोबार पर एक प्रकार का कब्ज़ा कर डाला। वही जेल से आने के बाद शानू लफ्फाज़ का लीगल कारोबार डैमेज हो चूका था। इसी दरमियान इरफ़ान चूड़ी से बसअड्डे के पार मारपीट और रंगदारी मांगने के आरोप सनी, जीशन और शाहिद पिच्चा पर लगा।

शाहिद पिच्चा अपराध जगत में एक बेख़ौफ़ अपराधी बन चूका था। इसके काम करने का अंदाज़ भी बिल्लू जैसा है। थानों पर पकड़ रखने वाले हसीब के साथ इसको देखा जाता था तो दो पत्रकारों के साथ भी इसके गठजोड़ बहुत बढ़िया थे। भले ही यह गठजोड़ मौकापरस्ती वाले ही क्यों न हो। इस दरमियान भईया से एचएस शब्लू बिल्डर का कारोबारी विवाद जन्म ले बैठता था। ऐसे ही एक पत्रकार जो वर्त्तमान में जेल के अंदर बंद है ने भईया और शब्लू बिल्डर के बीच पंचायत करवा कर मामले में सुलह करवाया। मगर शाहिद पिच्चा के दिमाग में कुछ शायद अलग ही मामला चल रहा होगा। जिसके बाद जो हुआ वह वाकई एक बड़ी अपराधिक घटना है। शाहिद पिच्चा को मुठभेड़ में पैर में गोली लगने के बाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

उसके जेल जाने के महज़ तीन दिनों बाद ही शब्लू बिल्डर पर जानलेवा हमला होता है। इस हमले का मुख्य सूत्रधार शाहिद पिच्चा को माना जा रहा है। कानपुर में खाली पड़े अपराध जगत पर अपने कब्ज़े के लिए हमारे सूत्र बताते है कि शाहिद पिच्चा ने रईस के करीबी सीतापुरिया मोनू पहाड़ी के करीबी शीमु, अपराध जगत की चटनी खकार बैठे अपने जीजा जीशन मोरंग और उसके भाई सनी मोरंग का साथ है, सूत्र बताते है कि शरीफ डफाली भी इसी गैंग का हिस्सा बन चूका है, मगर वह अधिकतर शहर के बाहर रहता है। शाहिद पिच्चा का साथ देने के लिए जेल में उसके शरणदाता पत्रकार है। तो गलियों की शोभा बढाने वाले भी पत्रकार है। थाने पर अच्छी खासी पैठ रखने वाले हसीब जैसे लोग बैठे है तो फिर अपराधिक तव गर्म होने और उस पर गैंग बनने की रोटी सेकने में कितना वक्त लगेगा।

फिलहाल शब्लू बिल्डर की गोली मार कर हत्या करने का प्रयास करने वाले तीन अज्ञात में दो युवक की शिनाख्त जीशान कुरैशी और फैसल के रूप में किया है। दोनों को समाचार सम्पादित किये जाते वक्त मिल रही जानकारी के अनुसार मुठभेड़ में गोली लगी है। पुलिस उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाने ले गई है। दूसरी तरफ नामज़द अन्य अभियुक्त भईया, शाहिद पिच्चा की माँ, सनी मोरंग, जीशन मोरंग और युसूफ चटनी अभी फरार है।

अब सबसे बड़ी बात देखने वाली ये होगी कि शाहिद पिच्चा की काल डिटेल के अनुसार सफ़ेदपोशो पर अपनी पकड़ कानपुर कमिश्नरेट पुलिस बनाएगी या फिर सिर्फ नामज़द आरोपियों पर ही पकड़ बनेगी और ज़मानत के बाद अथवा जेल के अन्दर रहकर शाहिद पिच्चा अपने गैंग का सञ्चालन करेगा।

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