बिहार में ‘SIR’ पर हंगामा: विपक्ष ने संसद के बाहर किया जोरदार प्रदर्शन, आखिर क्या है यह मुद्दा और क्या कहा विपक्ष और सत्ता पक्ष ने

तारिक खान

PNN24 News, नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही सियासी पारा चढ़ गया है। विपक्ष ने एकजुट होकर बिहार में चल रहे ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के मुद्दे पर संसद के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। सांसदों ने काली कमीज पहनकर और हाथों पर काली पट्टी बांधकर सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया। लेकिन सवाल यह है कि यह ‘SIR’ क्या है, जिसने अचानक संसद से लेकर पटना की गलियों तक इतना बड़ा सियासी भूचाल ला दिया है?

दरअसल, ‘एसआईआर’ (SIR) का मतलब है Special Intensive Revision यानी मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत चुनाव आयोग मतदाताओं की सूची को अपडेट करता है। इसमें नए मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं, पुराने मतदाताओं के पते बदले जाते हैं, और उन लोगों के नाम हटाए जाते हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है या जो स्थायी रूप से कहीं और चले गए हैं। बिहार में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई इस प्रक्रिया पर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस पुनरीक्षण के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम जानबूझकर मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं।

विपक्ष के प्रमुख आरोप:

  • ‘वोट चोरी’ का आरोप: विपक्ष का कहना है कि यह ‘वोट चोरी’ की कोशिश है। कांग्रेस और आरजेडी जैसे दलों का आरोप है कि जिन लोगों के नाम काटे जा रहे हैं, वे खास समुदाय या वर्ग से ताल्लुक रखते हैं, जो मौजूदा सरकार के खिलाफ मतदान करते हैं।
  • प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी: विपक्षी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। उनका कहना है कि जिन लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं, उन्हें इसकी ठीक से सूचना नहीं दी जा रही है।
  • चुनावी फायदे के लिए साजिश: विपक्ष इसे आगामी चुनावों में सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाने की एक सुनियोजित साजिश बता रहा है। उनका कहना है कि यह प्रयोग पहले बिहार में किया जा रहा है और अगर यह सफल रहा तो इसे पूरे देश में दोहराया जाएगा।

दूसरी ओर, सरकार और चुनाव आयोग ने विपक्ष के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से चुनाव आयोग द्वारा की जा रही है और सरकार का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है। उनका तर्क है कि मतदाता सूची को स्वच्छ और सटीक बनाना चुनाव आयोग का काम है। चुनाव आयोग ने भी इस मामले पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है और जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, वे ज्यादातर या तो मृत्यु हो चुके हैं या फिर स्थायी रूप से अपने पते बदल चुके हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि अगर किसी का नाम गलती से कट गया है, तो वह आसानी से दोबारा नाम जुड़वा सकता है।

इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में जबरदस्त हंगामा हुआ है, जिसके कारण कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है। विपक्ष इस मुद्दे पर सदन में चर्चा की मांग पर अड़ा है, जबकि सरकार का कहना है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है और उसकी प्रक्रियाओं पर सदन में चर्चा नहीं हो सकती। फिलहाल, इस सियासी जंग में मतदाता सूची का मुद्दा एक बड़ा हथियार बन गया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष अपने प्रदर्शन से सरकार पर कितना दबाव बना पाता है और क्या इस मुद्दे का असर बिहार और देश की आगामी राजनीति पर पड़ेगा।

आरजेडी सांसद मनोज झा ने संसद परिसर में न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा, ‘किसी पार्टी के इशारे पर जब (मतदान से) बेदखली की परियोजना चलाते हैं तो इतिहास भुगतेगा।’ वहीं कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने संसद परिसर में कहा, ‘वोट बंदी हो रही है तो हम इसके ख़िलाफ़ हैं।’ विपक्ष के आरोप पर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा, ‘सरकार हर विषय पर चर्चा करने के लिए तैयार है। सदन तो चलने दीजिए। एसआईआर को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है।’ बिहार में ऐसे समय में चुनाव आयोग एसआईआर करा रहा है जब इस साल के आखिर में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं।

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