PNN24 News: तिहाड़ से बिहार की राह! शरजील इमाम ने चुनाव लड़ने के लिए कोर्ट में लगाई अंतरिम जमानत की गुहार, क्या मिल पाएगी ‘राजनीतिक’ आज़ादी?

PNN24 News: 2020 दिल्ली दंगों (Delhi Riots) की साज़िश के आरोप में UAPA के तहत जेल में बंद शरजील इमाम (Sharjeel Imam) ने बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Vidhan Sabha Chunav) लड़ने के लिए दिल्ली कोर्ट में 14 दिन की अंतरिम जमानत (Interim Bail) की अर्जी लगाई है। क्या 'राजनीतिक कैदी' (Political Prisoner) का तर्क देकर शरजील नामांकन दाखिल कर पाएंगे? बहादुरगंज (Bahadurganj) सीट से चुनाव लड़ने के उनके फैसले और कोर्ट में पेश किए गए कानूनी तर्कों पर पूरी और एक्सक्लूसिव रिपोर्ट पढ़ें!

ईदुल अमीन

डेस्क: 2020 के दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साज़िश’ के मामले में UAPA के तहत जेल में बंद छात्र कार्यकर्ता शरजील इमाम ने एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने आगामी बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में 14 दिनों की अंतरिम ज़मानत (Interim Bail) की याचिका दायर की है।

शरजील इमाम, जो पिछले पांच साल से अधिक समय से न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में हैं, अपनी रिहाई चाहते हैं ताकि वह बिहार की बहादुरगंज विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल कर सकें और चुनाव प्रचार कर सकें।

‘राजनीतिक कैदी’ का तर्क और कानूनी दांव-पेंच

शरजील इमाम ने अपनी याचिका में खुद को “एक राजनीतिक कैदी और छात्र कार्यकर्ता” बताया है। उनकी तरफ से यह तर्क दिया गया है कि चुनाव लड़ना एक लोकतांत्रिक अधिकार है, और उन्हें नामांकन पत्र भरने तथा चुनावी व्यवस्थाएं करने के लिए अस्थाई रिहाई मिलनी चाहिए।

उनकी याचिका में पूर्व में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे राजनीतिक नेताओं को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दिए जाने के फैसलों का भी हवाला दिया गया है। इमाम के वकीलों का कहना है कि:

  • उन्हें चुनाव लड़ने से वंचित करना उनके लोकतांत्रिक अधिकार का हनन होगा।
  • वह एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, और उनके बीमार माँ की देखभाल कर रहे छोटे भाई के अलावा उनका प्रचार संभालने वाला कोई नहीं है।

क्यों मुश्किल है राह?

शरजील इमाम के लिए जमानत की राह आसान नहीं है। वह दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साज़िश के मामले में न्यायिक हिरासत में हैं, जिसमें उन पर देशद्रोह, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने और UAPA (गैर कानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम) जैसे कड़े कानून के तहत आरोप लगाए गए हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट पहले ही उनकी नियमित जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर चुका है कि ‘विरोध के नाम पर हिंसा करना अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है।’ हालांकि, इस आदेश के खिलाफ उनकी अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

कोर्ट अब शरजील इमाम की इस अंतरिम याचिका पर सुनवाई करेगी। फैसला यह तय करेगा कि एक ओर जहां एक आरोपी पर देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर आरोप हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव लड़ने के एक नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार का क्या महत्व है।

क्या शरजील इमाम जेल की सलाखों से बाहर निकलकर चुनावी मैदान में उतर पाएंगे, या अदालत उनकी याचिका को खारिज कर देगी? यह फैसला न केवल उनके राजनीतिक भविष्य, बल्कि न्यायपालिका और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन पर भी एक बड़ा संदेश देगा।

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