रूह को मिला इन्साफ: रामनगर के सुजाबाद में 8 वर्षीय मासूम से दुष्कर्म और हत्या मामले में आरोपी इरशाद को अदालत ने पाया दोषी, संगीन जुर्म के लिए सुनाई सजा-ए-मौत

शफी उस्मानी
वाराणसी: एक ऐसी घटना जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया था का इन्साफ आज अदालत से मिल गया। 8 साल की एक मासूम बालिका, जिसकी आंखों में सपनों की चमक थी, उसकी जिंदगी एक क्रूर अपराधी के हाथों हमेशा के लिए बुझ गई। दुष्कर्म, हत्या, और फिर सिर को पत्थर से कुचल देना यह न सिर्फ एक अपराध था, बल्कि मानवता के खिलाफ एक काला अध्याय। लेकिन जहां अंधेरा गहरा था, वहां न्याय की किरण चमकी। POCSO कोर्ट के तीसरे न्यायाधीश विनोद कुमार ने आरोपी इरशाद को फांसी की सजा सुनाई है, जो न सिर्फ पीड़िता के परिवार के लिए इंसाफ ही नहीं है, बल्कि इस फैसले ने एक नजीर कायम कर दिया है।
यह दर्दनाक प्रकरण वाराणसी के सुजाबद थाना रामनगर से जुड़ा है। 24 दिसंबर 2024 की शाम 7 बजे जब बच्ची अपने घर से मच्छर वाली अगरबत्ती लेने दुकान गई थी, वहां मौका पाकर सन्नाटे का फायदा उठाते हुए आरोपी इरशाद ने क्रूरता की हद पार करते हुए बालिका के साथ दुष्कर्म कर उसकी हत्या कर दी और लाश की पहचान छिपाने के लिए सिर को पत्थर से कुचल दिया था। घटना को कारित कर ज़ालिम इरशाद ने शव बोरी में भरकर प्राथमिक विद्यालय बहादुरपुर में फेक दिया था। यह खबर सुनते ही पूरा शहर सन्न रह गया। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल था। एक मां का दर्द, एक पिता की बेबसी, और समाज की चुप्पी। लेकिन न्याय व्यवस्था ने साबित किया कि अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए, चाहे कितना भी ताकतवर हो।
रामनगर पुलिस ने मामले में इरशाद को गिरफ्तार कर जेल भेजा और केस POCSO एक्ट के तहत चला, जहां बच्चों के खिलाफ अपराधों पर सख्ती का प्रावधान है। जांच एजेंसियों ने तेजी से सबूत इकट्ठा किए। मेडिकल रिपोर्ट्स, फॉरेंसिक एविडेंस, और 7 गवाहों के बयान हुआ। लेकिन असली जंग कोर्टरूम में लड़ी गई। यहां उतरे वकीलों एडवोकेट तनवीर अहमद सिद्दीकी व एडवोकेट अहमद खलीफा और उनकी टीम, इनकी दलीलें इतनी मजबूत थीं कि हर तर्क अपराधी के खिलाफ खड़ा हो गया।
स्पेशल लोक अभियोजक संदीप कुमार जायसवाल ने अपनी पैनी नजर और कानूनी कुशलता से केस को मजबूत बनाया। घंटों चली बहस, दस्तावेजों की बौछार, और अपराधी के झूठ को बेनकाब कर अधिवक्ताओं की टीम ने किया। जिसके बाद न्यायधीश विनोद कुमार ने सबूतों की समीक्षा करते हुवे दोषसिद्ध इरशाद को फांसी का फैसला सुनाया। सजा सुनकर ज़ालिम इरशाद की आँखों से आंसू की धार बहने लगी। एक मासूम को मौत की दहलीज़ तक पहुचाने वाले इरशाद को जब खुद अपनी मौत नज़र आई तो वह रोने लगा।
इस फैसले से मृत बालिका का परिवार थोड़ा सुकून महसूस कर रहा है। “हमारी बेटी को वापस नहीं मिलेगी, लेकिन कम से कम अपराधी को सजा मिली,” परिवार ने कहा। यह जीत सिर्फ वकीलों और प्रॉसिक्यूटर की नहीं, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की है।












