‘हर बात में न्यायपालिका क्यों?’ चुनाव आयुक्तों के चयन पर रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस को घेरा, बोले- यह ‘लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं’

आफताब फारुकी
PNN24 न्यूज़, नई दिल्ली। लोकसभा में चुनाव सुधार पर चल रही महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान, चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को बाहर रखने के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। बुधवार को, बीजेपी सांसद और पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए ‘शक्तियों के पृथक्करण‘ (Separation of Power) का तर्क दिया।

‘बिना CJI के आप चयन में नहीं जाएंगे?’
रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस नेताओं पर पलटवार करते हुए सवाल किया कि क्या विपक्ष को प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष वाले पैनल पर भरोसा नहीं है।
- विपक्ष पर सवाल: उन्होंने कहा, “चुनाव आयुक्त के चयन के लिए क़ानून बना, उसमें प्रधानमंत्री हैं, विपक्ष के नेता हैं। विपक्ष के नेता से आप चाहते क्या हैं? बिना चीफ़ जस्टिस के सपोर्ट के आप वहां (चयन प्रक्रिया में) जाएंगे नहीं?”
- शक्तियों का पृथक्करण: प्रसाद ने न्यायपालिका का सम्मान करते हुए भी यह सवाल उठाया कि, “हम सभी न्यायपालिका का सम्मान करते हैं। लेकिन न्यायपालिका को हर चीज़ में शामिल करना क्या सही है? क्या ये ‘सेपरेशन ऑफ़ पावर‘ के ख़िलाफ़ तो नहीं है?”
- लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं: उन्होंने कहा कि हर काम के लिए CJI की जरूरत बताना हमारी कमज़ोरी दिखाता है। “हम अपने से कुछ नहीं कर पाएंगे, जब तक सीजेआई नहीं आएंगे। ये लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।”
‘चुनी हुई सरकार पर भरोसा क्यों नहीं?’
रविशंकर प्रसाद ने अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए देश के अन्य महत्वपूर्ण पदों के चयन प्रक्रिया का उदाहरण दिया और पूछा कि क्या देश की चुनी हुई सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
- अन्य संवैधानिक पद: उन्होंने सवाल किया, “भारत की राजनीतिक व्यवस्था देश का राष्ट्रपति चुनती है कि नहीं? उप-राष्ट्रपति को चुनती है कि नहीं? आर्मी चीफ़ और नेवल चीफ़ को चुनती है कि नहीं? भारत के प्रधानमंत्री के पास न्यूक्लियर बटन होता है कि नहीं?”
- क्षमता पर प्रश्न: उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर देश की जनता प्रधानमंत्री और सरकार पर सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक रणनीति के लिए विश्वास करती है, तो: “भारत की चुनी हुई सरकार इतना कर सकती है लेकिन एक अच्छा चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर नहीं चुन सकती। ये कौन-सी बात कही जा रही है?”
बीजेपी और कांग्रेस के बीच यह वैचारिक टकराव स्पष्ट करता है कि देश में संस्थागत स्वतंत्रता और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर गहरी मतभेद हैं।










