न्याय की जीत! ‘अवैध प्रवासी’ बताकर बांग्लादेश भेजी गई गर्भवती सुनाली ख़ातून बेटे के साथ वापस भारत लौटीं, TMC ने बताया ‘बंगाल-विरोधी’ सोच का नतीजा

आफताब फारुकी
PNN24 न्यूज़ डेस्क: पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले की रहने वाली सुनाली ख़ातून और उनके आठ साल के बेटे के लिए छह महीने की अकल्पनीय पीड़ा का अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, जिन्हें जून 2025 में ‘अवैध बांग्लादेशी प्रवासी‘ बताकर जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया था, वे आखिरकार ‘मानवीय आधार‘ पर वापस भारत लौट आई हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस घटना को ‘बंगाल-विरोधी‘ सोच का परिणाम बताया है और न्याय की जीत पर ख़ुशी ज़ाहिर की है।
छह महीने की अकल्पनीय पीड़ा
सुनाली ख़ातून और उनका परिवार दिल्ली में कचरा बीनने का काम करता था। जून 2025 में, उन्हें पुलिस ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासी होने के शक़ में हिरासत में लिया।
- जबरन निर्वासन: सुनाली को पहले असम ले जाया गया, जहाँ से उन्हें जबरदस्ती बांग्लादेश की सीमा के भीतर छोड़ दिया गया था, जबकि वह भारतीय नागरिक थीं।
- बांग्लादेश में जेल: भारत लौटने के प्रयास में, उन्हें बांग्लादेश की पुलिस ने पकड़ लिया और वहाँ उन्हें जेल में रखा गया था। इस दौरान सुनाली गर्भवती थीं और उनके साथ उनका नाबालिग बेटा भी था।
सुप्रीम कोर्ट से मिली ‘मानवीय आधार’ पर राहत
बुधवार को, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने ‘मानवीय आधार‘ पर सुनाली ख़ातून और उनके बच्चे को भारत में प्रवेश की अनुमति दे दी।
- स्वास्थ्य निर्देश: अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार से बच्चे की देखभाल करने को कहा। साथ ही, बिरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को निर्देश दिया कि गर्भवती सुनाली ख़ातून को हर संभव चिकित्सकीय मदद दी जाए।
TMC का तीखा हमला: ‘बंगाल-विरोधी ज़मींदारों की साज़िश’
तृणमूल कांग्रेस ने इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग देते हुए केंद्र सरकार और एजेंसियों पर तीखा हमला बोला है।
- न्याय की जीत: पार्टी ने एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “छह लंबे महीनों के बाद आखिरकार न्याय की जीत हुई। बंगाल की महिला सुनाली ख़ातून को एक बंगाल-विरोधी सोच के चलते अपने ही देश से बाहर धकेल दिया गया था। आज जब सुनाली लौट रही है, तो यह एक बड़ी गलती के ठीक होने जैसा लगता है।”
- सांसद का बयान: पार्टी के राज्यसभा सांसद और पश्चिम बंगाल प्रवासी मज़दूर बोर्ड के चेयरमैन समीरुल इस्लाम ने एक्स पर पोस्ट किया, “अंततः बांग्ला विरोधी ज़मींदारों के ख़िलाफ़ एक लंबी लड़ाई के बाद सुनाली ख़ातून और उनका नाबालिग बेटा भारत लौट आए हैं।” उन्होंने जबरन निर्वासन को ‘अकल्पनीय पीड़ा’ बताया।
सुनाली ख़ातून की वापसी सिर्फ एक प्रशासनिक भूल का सुधार नहीं है, बल्कि यह नागरिकता और मानवाधिकारों के एक बड़े मुद्दे को उजागर करती है, जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।











