‘वंदे मातरम्’ पर ऐतिहासिक सच्चाई: सब्यसाची भट्टाचार्य की किताब के प्रमुख अंश

तारिक आज़मी
PNN24 न्यूज़ डेस्क: इतिहासकार और समाजशास्त्री सब्यसाची भट्टाचार्य की पुस्तक ‘वंदे मातरम्‘ इस राष्ट्रगीत के रचना, लोकप्रियता और विवाद के पूरे इतिहास को सिलसिलेवार और प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करती है। कांग्रेस द्वारा 1937 में गीत के अंशों को छाँटने के फैसले पर जो राजनीतिक विवाद चल रहा है, उस पर यह किताब एक ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करती है।
भट्टाचार्य की किताब के प्रमुख बिंदु
सब्यसाची भट्टाचार्य की पुस्तक, और 1937 के घटनाक्रम पर उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़, कांग्रेस के फैसले की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हैं:
1. गीत का विकास और संदर्भ
- रचना और उपन्यास: बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे 1870 के शुरुआती वर्षों में एक वंदना-गीत के रूप में रचा था। 1881 में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ‘ में शामिल किया गया।
- ‘हिन्दू युद्धघोष‘ का रूप: कथा के संदर्भ के भीतर, इस गीत ने विस्तृत रूप में ‘हिन्दू-युद्धघोष‘ का रूप धारण कर लिया था। यही कथा संदर्भ गीत के विरोध का मुख्य आधार बना।
- राजनीतिक नारा: 1905 के बंगाल विभाजन विरोधी (स्वदेशी) आंदोलन ने इस गीत को राजनीतिक नारे में तब्दील कर दिया और यह ‘राष्ट्रगान’ जैसी हैसियत पा चुका था।
2. विवाद का उदय
- धार्मिक आपत्तियाँ (1930 का दशक): 1930 के दशक में, गीत के बिंब-विधान (Imagery), व्यंजना और मूर्तिपूजकता (Idolatry) को लेकर व्यापक विरोध शुरू हुए। गीत के बाद के छंदों में देवी दुर्गा के संदर्भ थे, जिन्हें गैर-हिंदू समुदाय के नेता आपत्तिजनक मानते थे।
- जिन्ना का विरोध: मोहम्मद अली जिन्ना इस गीत के सबसे बड़े आलोचकों में से एक थे, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया।
3. 1937 का कांग्रेस कार्यसमिति का फैसला
- जाँच समिति: विवाद बढ़ने पर, कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने एक उप-समिति (Sub-committee) का गठन किया। इस समिति में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेंद्र देव जैसे दिग्गज नेता शामिल थे। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर से भी सलाह लेने का फैसला किया।
- टैगोर का प्रभाव: ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं नेहरू को सलाह दी थी कि गीत के पहले दो छंदों को अपनाया जाए। इन शुरुआती छंदों में मातृभूमि की सुंदरता और उपहारों का वर्णन है, जिसमें किसी भी धार्मिक समूह को आपत्ति नहीं हो सकती थी।
- समावेशी निर्णय: अक्टूबर 1937 में CWC ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि केवल पहले दो छंदों का ही राष्ट्रीय सभाओं में प्रयोग किया जाएगा।
- CWC का मानना था कि पहले दो छंद राष्ट्रीय आंदोलन का एक जीवित और अटूट हिस्सा बन चुके हैं और इनमें कोई आपत्तिजनक तत्व नहीं है।
- बाकी छंद, जिनमें धार्मिक विचारधारा या मूर्तिपूजा का भाव था, कम गाए जाते थे और उन्हें हटा दिया गया ताकि यह गीत गैर-हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय आंदोलन को समावेशी बनाए रखे।
- उपहार की तुलना में राष्ट्रगान: अंततः, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन गण मन‘ को राष्ट्रगान (National Anthem) और ‘वंदे मातरम्‘ को समान सम्मान देते हुए राष्ट्रगीत (National Song) के रूप में अपनाया।
भट्टाचार्य और अन्य ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि वंदे मातरम् को छोटा करने का निर्णय किसी एक व्यक्ति (जैसे नेहरू) का नहीं, बल्कि गांधीजी, नेहरू, बोस, पटेल और आज़ाद जैसे सभी प्रमुख नेताओं वाली CWC का सामूहिक और समावेशी फैसला था, जो उस समय राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए लिया गया था।












