बिहार में ‘अतिक्रमण’ के नाम पर महादलितों पर टूटा बुलडोजर: कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे परिवार; सरकारी विरोधाभास— पहले घर बनाने का पैसा दिया, अब बता रहे अवैध!

शफी उस्मानी

डेस्क: बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद राज्यभर में ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ ने रफ्तार पकड़ ली है। पटना से लेकर दरभंगा और नालंदा तक प्रशासन का बुलडोजर गरज रहा है। लेकिन कड़ाके की इस सर्द रात में उन हजारों चेहरों पर खौफ और आंसू हैं, जिनके आशियाने मिट्टी में मिला दिए गए हैं। सबसे बड़ा सवाल उस सरकारी विरोधाभास पर उठ रहा है, जहाँ प्रशासन ने ही सालों पहले घर बनाने के लिए ‘आवास योजना’ की राशि दी थी और अब उन्हीं घरों को ‘अवैध’ बताकर ढहाया जा रहा है।

सम्राट चौधरी का पक्ष: “कोर्ट के आदेश पर हो रही कार्रवाई” बिहार सरकार के गृह मामलों के मंत्री सम्राट चौधरी ने विधानसभा में इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि न्यायालय के निर्देश पर माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चाहे जमीन माफिया हो, बालू या शराब माफिया, कार्रवाई होकर रहेगी। हालांकि, जमीन पर हकीकत कुछ और है, जहाँ माफियाओं की जगह दशकों से बसे भूमिहीन महादलित परिवार बेघर हो रहे हैं।

नालंदा के शिवनंदन नगर की त्रासदी: कलकैला तालाब के किनारे दशकों से बसे महादलित परिवारों (मुख्यतः पासवान समुदाय) पर पटना हाईकोर्ट के आदेश के बाद गाज गिरी है। प्रशासन का मानना है कि इन परिवारों ने 20 एकड़ में फैले तालाब का अतिक्रमण किया है।

  • रिटायर्ड पुलिसकर्मी का दर्द: बिहार पुलिस से मेडल प्राप्त और रिटायर हुए रामविलास पासवान का घर भी ढहा दिया गया। वे रुंधे गले से पूछते हैं, “पेंशन के पैसे से घर बनाया था। क्या मैं माफिया था? अगर घर तोड़ना ही था तो पहले मेडल और पैसा क्यों दिया?”

अजीब विरोधाभास: सरकारी योजनाओं से बने घर हुए ‘अवैध’ शिवनंदन नगर की चिंता देवी और राजो देवी जैसे कई लोगों की कहानी एक जैसी है। इन परिवारों को सालों पहले इंदिरा आवास योजना और हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत घर बनाने के लिए किश्तें मिली थीं।

  • सवाल: अगर यह जमीन अतिक्रमण की थी, तो सरकार ने यहाँ बिजली, नल और घर बनाने के लिए सरकारी राशि क्यों दी? आज उन्हीं ईंटों पर प्रशासन बुलडोजर चला रहा है जिन्हें सरकार ने ही खड़ा करवाया था।

दरभंगा: पन्नी के नीचे कट रही महादलितों की रात दरभंगा के लाल शाहपुर में 200 परिवारों की बस्ती पर बिना किसी पूर्व नोटिस के बुलडोजर चला दिया गया। कमलमुखी देवी और सुशीला देवी बताती हैं कि कड़ाके की ठंड में वे प्लास्टिक की पन्नी टांगकर रात गुजार रहे हैं। सुशीला कहती हैं, “हमारी सास और ददिया सास भी यहीं रहीं। हम मजदूर आदमी अब दोबारा घर कहाँ बनाएंगे? सरकार हमें जहर खिलाकर मार क्यों नहीं देती?”

प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई कोर्ट के आदेश का पालन है, लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से यह अभियान कई सवाल छोड़ रहा है। उजाड़े गए लोगों को वैकल्पिक जमीन के पट्टे दिए जा रहे हैं, लेकिन सुविधाओं के अभाव में लोग नाखुश हैं। क्या न्याय की प्रक्रिया में उन गरीबों का कोई स्थान नहीं है जो दशकों से सरकारी योजनाओं के भरोसे अपना घर बना रहे थे?

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