‘बेल’ या ‘जेल’? सुप्रीम कोर्ट के दो विरोधाभासी फैसलों ने छेड़ी नई बहस; उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत क्यों नहीं?

ईदुल अमीन

नई दिल्ली: सोमवार, 5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। ठीक अगले ही दिन, 6 जनवरी को एक दूसरी पीठ ने ‘अनुच्छेद 21’ (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का हवाला देते हुए एक अन्य अभियुक्त को जमानत दे दी। इन दो फैसलों ने कानूनी हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

कोर्ट का तर्क: ‘केंद्रीय भूमिका’ बनाम ‘स्थानीय भागीदारी’

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगा मामले के 7 अभियुक्तों में से 5 को जमानत दी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं दी। कोर्ट के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे:

  • प्रथम दृष्टया साक्ष्य: कोर्ट ने माना कि पुलिस की चार्जशीट के आधार पर दोनों की भूमिका दंगों की योजना बनाने और उसे दिशा देने में ‘केंद्रीय’ थी।
  • संगीन इल्ज़ाम: कोर्ट के अनुसार, केवल 5 साल जेल में रहना जमानत का आधार नहीं हो सकता, अगर अपराध ‘यूएपीए’ (UAPA) जैसी गंभीर धाराओं के तहत हो।
  • भेदभाव का आधार: अन्य 5 अभियुक्तों को जमानत इसलिए मिली क्योंकि कोर्ट ने उनकी भागीदारी को ‘स्थानीय’ और सीमित माना।

विकट कानून: क्या है UAPA की धारा 43D(5)?

यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत जमानत मिलना बेहद कठिन है।

  1. प्रथम दृष्टया परीक्षण: कोर्ट को सिर्फ यह देखना होता है कि पुलिस की फाइल में सबूत ‘सही प्रतीत’ होते हैं या नहीं। वह सबूतों की गहराई या उनकी सत्यता की जांच ट्रायल से पहले नहीं कर सकती।
  2. 2019 का ‘वतली’ फैसला: सुप्रीम कोर्ट के इस पुराने फैसले ने अदालतों के हाथ बांध दिए हैं, जिससे वे पुलिस की कहानियों पर सवाल नहीं उठा पातीं।

अनुच्छेद 21 बनाम कानूनी प्रक्रिया

मंगलवार को एक अन्य मामले में कोर्ट ने कहा कि ‘राइट टू स्पीडी ट्रायल’ (त्वरित सुनवाई का अधिकार) एक मौलिक अधिकार है। कानून विशेषज्ञ गौतम भाटिया और सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े का तर्क है कि:

  • अगर 5 साल तक ‘चार्ज’ भी फ्रेम नहीं हुए हैं, तो यह सीधे तौर पर अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
  • बिना सजा के लंबी कैद (Pre-trial detention) अपने आप में एक सजा बन गई है।

विशेषज्ञों की राय:

  • हरीश साल्वे (सीनियर एडवोकेट): “यूएपीए जैसे कानूनों में ‘बेल इज द रूल’ (जमानत नियम है) का सिद्धांत लागू नहीं होता। राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है।”
  • संजय हेगड़े (सीनियर एडवोकेट): “यह फैसला लोकतांत्रिक असहमति और विरोध प्रदर्शनों को अपराध की श्रेणी में डालने जैसा है।”

अब आगे क्या?

उमर खालिद और शरजील इमाम अब एक साल बाद दोबारा जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं। वर्तमान में यह मामला ‘चार्ज फ्रेम’ होने के चरण में है, जिसकी औपचारिक शुरुआत सितंबर 2024 से हुई है।

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