चुनाव आयुक्तों को ‘उम्रभर की सुरक्षा’ देने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; केंद्र से पूछा— राष्ट्रपति को भी जो छूट नहीं, वो इन्हें क्यों?

आफताब फारुकी
नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (EC) को आपराधिक मुकदमों से ‘जीवन भर संरक्षण’ देने वाले नए कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग से जवाब तलब किया है। सोमवार (12 जनवरी 2026) को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक गंभीर संवैधानिक मुद्दा माना है।

“फिलहाल लागू किसी अन्य कानून में कुछ भी होने के बावजूद, कोई भी कोर्ट किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कोई भी कार्यवाही शुरू नहीं करेगा, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त है या था।”
याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें:
- संविधान से ऊपर नहीं: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ऐसी व्यापक छूट भारत के राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपालों को भी प्राप्त नहीं है।
- अंतिम समय में बदलाव: दलील दी गई कि यह विवादित प्रावधान मूल विधेयक का हिस्सा नहीं था, बल्कि इसे अंतिम समय में गुप्त रूप से जोड़ा गया था।
- स्वतंत्र चुनाव पर खतरा: याचिका में कहा गया कि आपराधिक अभियोजन से ऐसी सुरक्षा ‘सेवा शर्त’ नहीं हो सकती और यह स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की लोकतांत्रिक अवधारणा को नुकसान पहुँचाती है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले की गंभीरता को स्वीकार किया। पीठ ने कहा, “यह एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा है। कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि क्या संविधान के तहत ऐसी छूट दी जा सकती है और क्या यह प्रावधान किसी प्रकार का संवैधानिक नुकसान पहुँचा रहा है।” हालांकि, कोर्ट ने फिलहाल इस कानून पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
आगे क्या होगा? केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को अब अपना जवाब कोर्ट में दाखिल करना होगा। इस सुनवाई के नतीजे भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों की जवाबदेही और उनके संवैधानिक अधिकारों की नई व्याख्या तय करेंगे।











