यूजीसी के ‘भेदभाव’ नियम पर सुप्रीम कोर्ट की रोक; गिरिराज सिंह ने बताया बड़ी राहत, बोले— “मोदी सरकार में भेदभाव की राजनीति नहीं”

बड़ी खबर: यूजीसी के विवादित 'भेदभाव' नियम पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बताया 'बड़ी राहत'। पीएम मोदी और अमित शाह का जताया आभार। जानें क्या है पूरा मामला।

आफताब फारुकी

नई दिल्ली/वाराणसी: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उन नए नियमों पर, जिन्हें लेकर देश भर के शिक्षण संस्थानों और कुछ राजनीतिक संगठनों में तीखी बहस छिड़ी हुई थी, अब माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने रोक लगा दी है। इस फैसले का स्वागत करते हुए केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के फायरब्रैंड नेता गिरिराज सिंह ने इसे विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए एक ‘बड़ी राहत’ करार दिया है।

संविधान की जीत: गिरिराज सिंह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद गिरिराज सिंह ने सोशल मीडिया के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का आभार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा:

“यूजीसी नियम पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के रोक से देश के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। मोदी सरकार की पहचान सबका साथ, सबका विकास और एकता के साथ न्याय, संतुलन व संवैधानिक मूल्यों की दृढ़ रक्षा है।”

“भेदभाव की राजनीति नहीं करती सरकार” इससे पहले समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में गिरिराज सिंह ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार कभी भी भेदभाव की राजनीति में विश्वास नहीं रखती। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार का हर कदम संवैधानिक मर्यादा और समानता को बनाए रखने के लिए होता है।

क्या था यूजीसी का विवादित नियम? यूजीसी ने हाल ही में एक अधिसूचना जारी की थी जिसके तहत हर सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थान में एक ‘समता समिति’ (Equity Committee) गठित करना अनिवार्य किया गया था।

  • इस समिति का काम जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर होने वाले भेदभाव की शिकायतों की सुनवाई करना था।
  • विवाद की वजह: इस समिति में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को शामिल किए जाने के बाद ‘फर्जी आरोपों’ की आशंका को लेकर कई संगठनों (जैसे करणी सेना) और छात्रों ने इसका विरोध किया था।

सुप्रीम कोर्ट की इस रोक के बाद अब इस अधिसूचना के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है। जानकारों का मानना है कि अदालत अब इस नियम की संवैधानिक वैधता और इसके संभावित दुरुपयोग की बारीकी से जांच करेगी।

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