बिहार में ‘ज़िद’ बनाम ‘ज़रूरत’: बजट सत्र में शराबबंदी पर अपनों ने ही घेरा, क्या नीतीश कुमार को झुकने पर मजबूर करेगी बीजेपी और सहयोगी दल?
बिहार में क्या खत्म होगी शराबबंदी? बजट सत्र में नीतीश सरकार के सहयोगियों ने ही उठाए सवाल। जीतन राम मांझी से लेकर बीजेपी तक समीक्षा की मांग पर अड़े। 40,000 करोड़ की समानांतर अर्थव्यवस्था और राजस्व घाटे पर PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

अनिल कुमार
पटना: बिहार विधानमंडल के बजट सत्र में इस समय विकास के दावों से कहीं ज़्यादा गूंज ‘शराबबंदी कानून’ की समीक्षा को लेकर सुनाई दे रही है। ताज्जुब की बात यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस महात्वाकांक्षी नीति पर अब विपक्ष से ज़्यादा सत्ता पक्ष (NDA) के नेता और मंत्री सवाल उठा रहे हैं। होली से ठीक पहले छिड़ी यह बहस बिहार की सियासत में बड़े बदलाव का संकेत दे रही है।

राजस्व का घाटा और 40,000 करोड़ की समानांतर इकोनॉमी नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि शराबबंदी के नाम पर राज्य में 40,000 करोड़ रुपये की अवैध समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है।
- शून्य राजस्व: 2015-16 तक राज्य को मिलने वाली 3,142 करोड़ की एक्साइज ड्यूटी अब शून्य हो गई है।
- राजस्व हिस्सेदारी में गिरावट: साल 2014-15 में आय में शराब की हिस्सेदारी 21.99% थी, जो 2024-25 में घटकर 18.81% रह गई है। प्रशांत किशोर (जन सुराज) ने भी इसी आर्थिक नुकसान को आधार बनाकर सत्ता में आने पर एक घंटे के भीतर कानून खत्म करने का वादा किया है।
‘उड़ता बिहार’ की आहट: सूखा नशा बना बड़ी चुनौती सदन में चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि शराबबंदी के बाद राज्य में ‘सूखा नशा’ (गांजा, अफीम, कफ सिरप) तेज़ी से फैला है। भाकपा माले की शशि यादव ने चेतावनी दी कि बिहार अब ‘उड़ता बिहार’ बनता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक 4.50 करोड़ लीटर शराब और 15,800 किलो गांजा ज़ब्त किया गया है, जो सप्लाई चेन की मज़बूती की ओर इशारा करता है।
नेताओं का वाक-युद्ध और ‘ब्लड टेस्ट’ की मांग बहस इतनी निचले स्तर पर पहुँच गई है कि विधायक एक-दूसरे पर नशा करके सदन में आने के आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन ने तो सभी विधायकों और अधिकारियों के ब्लड टेस्ट की मांग कर दी है, ताकि शराबबंदी की पोल खुल सके।
नीतीश कुमार फिलहाल इस मुद्दे पर चुप हैं, लेकिन उनके इर्द-गिर्द घेराबंदी बढ़ गई है। बालू, भू और शराब माफियाओं के त्रिकोण ने बिहार की कानून-व्यवस्था को चुनौती दी है। क्या 2026 के इस बजट सत्र के बाद बिहार फिर से ‘उदार शराब नीति’ की ओर लौटेगा? यह सवाल अब करोड़ों बिहारियों की जुबां पर है।











