दालमंडी चौड़ीकरण: जर्जर भवनों के नाम पर ‘बुलडोजर’ का खौफ, क्या अदालत के आदेश भी हुए बेअसर?, 5 दिसंबर 2025 को जारी नोटिस अब तामील कर रहा है नगर निगम वाराणसी, कहा गया अब “अज्जू” का दावा ?

वाराणसी के दालमंडी (नया चौक/गुदड़ी मार्केट) में इन दिनों विकास के नाम पर 'विनाश' का डर फैला हुआ है। प्रशासन की नई कार्यशैली ने व्यापारियों की रातों की नींद उड़ा दी है।क्या है पूरा मामला? : बैकडेट नोटिस का खेल: नगर निगम ने 5 दिसंबर के हस्ताक्षर वाला नोटिस अब मार्च में चस्पा किया है। ढाई महीने तक इस नोटिस को दबाकर रखना साफ दर्शाता है कि व्यापारियों को कोर्ट जाने का मौका भी नहीं देना चाहती प्रशासन। जर्जर का बहाना, उजाड़ने का निशाना: जो भवन सालों से खड़े हैं, उन्हें अचानक 'जर्जर' बताकर तोड़ने की तैयारी है। परेशान भवन स्वामी अब अपना घर-बार बेचने को मजबूर हैं। त्यौहारों पर वार: एक तरफ होली का बाजार है और दूसरी तरफ रमजान/ईद की तैयारी। ऐसे समय में प्रशासनिक उत्पीड़न व्यापारियों की कमर तोड़ रहा है।

शफी उस्मानी

वाराणसी। बनारस की ऐतिहासिक गलियों और व्यापारिक केंद्र दालमंडी में इन दिनों विकास की बयार नहीं, बल्कि उजाड़ का सन्नाटा पसरा है। प्रशासन द्वारा चौड़ीकरण के नाम पर की जा रही कार्रवाई अब एक नया मोड़ ले चुकी है। अब भवनों को ‘जर्जर’ घोषित कर उन्हें जमींदोज करने का खेल शुरू हो गया है, जिससे परेशान होकर स्थानीय भवन स्वामी अपनी पुश्तैनी संपत्तियां बेचने को मजबूर हैं।

कागजी खानापूर्ति और ‘बैकडेट’ का खेल

प्रशासनिक कार्यशैली पर सबसे बड़ा सवालिया निशान नया चौक (गुदड़ी मार्केट) में लगे नोटिसों ने खड़ा कर दिया है। दो दिन पहले चस्पा किए गए इन नोटिसों पर नगर निगम के अधिकारी के हस्ताक्षर 5 दिसंबर के हैं। सवाल यह उठता है कि अगर नोटिस ढाई महीने पहले तैयार था, तो उसे अब तक दबा कर क्यों रखा गया?

इस ‘बैकडेट’ खेल का सीधा मतलब है कि प्रशासन ने कागजों पर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है, ताकि कोर्ट में यह दिखाया जा सके कि समय रहते सूचना दी गई थी। लेकिन धरातल पर दुकानदारों को संभलने या कानूनी रास्ता अपनाने का मौका तक नहीं दिया गया।

त्यौहारों की खुशी पर प्रशासनिक ग्रहण

एक तरफ होली का बाजार सज रहा है और दूसरी तरफ ईद की तैयारियां शुरू हो गई हैं। व्यापारियों के लिए यह साल का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। ऐसे में अचानक बुलडोजर का डर पैदा करना व्यापारियों के उत्पीड़न के तौर पर देखा जा रहा है। दुकानदार बेबस हैं—न उनके पास अदालत जाने का समय बचा है और न ही प्रशासन सुनने को तैयार है।

“कातिल जो हमारा है वह दिलदार तुम्हारा है, तुम झूठ को सच लिख दो अख़बार तो तुम्हारा है।” > यह पंक्तियाँ आज दालमंडी के हर उस दुकानदार के जहन में तैर रही हैं, जो अपनी रोजी-रोटी को लुटते देख रहे हैं।

प्रशासन की चुप्पी और नेताओं के खोखले दावे

हैरानी की बात यह है कि मीडिया को अंदर जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया है, जिससे प्रशासन की मनमानी पर कोई अंकुश नहीं रह गया है। जब इस संबंध में जोनल अधिकारी (कोतवाली) से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा।

वहीं दूसरी ओर, व्यापार मंडल के नेताओं के दावों की भी कलई खुलती नजर आ रही है। वाराणसी व्यापार मंडल के महामंत्री बताने वाले अजहर आलम ‘अज्जू’ बड़े-बड़े दावे कर रहे थे कि जिला प्रशासन से बात हो गई है और तोड़फोड़ ईद के बाद होगी। लेकिन रमजान का चांद नजर आने के बावजूद प्रशासन की सक्रियता उनके दावों को ‘थोथा’ साबित कर रही है।

बड़े सवाल:

  • क्या विकास के नाम पर हाईकोर्ट के आदेशों को दरकिनार करना उचित है?
  • जर्जर घोषित करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही?
  • इन मजलूम दुकानदारों और भवन स्वामियों की आवाज आखिर कौन सुनेगा?

दालमंडी के लोग आज इस ऊहापोह में हैं कि वे जाएं तो जाएं कहां? जिस प्रशासन को सुरक्षा और न्याय का प्रतीक होना चाहिए, वही आज उनके लिए खौफ का पर्याय बना हुआ है। अब देखना यह है कि क्या शासन के उच्च अधिकारी इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे या फिर दालमंडी का यह ऐतिहासिक व्यापारिक ढांचा बुलडोजर की भेंट चढ़ जाएगा।

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