इतिहास के पन्नों में दफन ‘फौलादी शेर’: मौलवी अहमदउल्ला शाह, जिनके सिर की कीमत अंग्रेजों ने 1858 में लगाई थी 50 हज़ार चांदी के सिक्के..!, जिनकी चमक से बिक कर राजा जगन्नाथ सिंह और उसके भाई बलदेव ने किया मौलवी का क़त्ल

1857 की क्रांति के 'फौलादी शेर' मौलवी अहमदउल्ला शाह फैजाबादी की अनकही कहानी। कैसे एक फकीर ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया और हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की। मगर लालची राजा जगन्नाथ सिंह और उसके भाई बलदेव सिंह ने अंग्रेजो से ईनाम की लालच में मौलवी अहमदुल्लाह का धोखे से क़त्ल कर दिया और उनका सर काट कर अंग्रेजो को भेज कर ईनाम की राशि ले लिया; PNN24 की विशेष ऐतिहासिक रिपोर्ट।

तारिक आज़मी

अयोध्या: 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का वह पन्ना है, जो अनगिनत कुर्बानियों से रंगा है। जब हम इस क्रांति के नायकों की बात करते हैं, तो झाँसी की रानी, तात्या टोपे और बहादुर शाह ज़फ़र के नाम ज़हन में आते हैं। लेकिन अवध की धरती पर एक ऐसा योद्धा भी था जिसे खुद अंग्रेज फौलादी शेर’ कहते थे। वे थे— मौलवी अहमदउल्ला शाह फैजाबादी, जिन्हें दुनिया ‘नक्कारशाह’ या ‘डंका शाह’ के नाम से भी जानती है।

डंका शाह: क्रांति का अनूठा सेनानी मौलवी साहब जब भी किसी मिशन पर निकलते, उनके आगे-आगे डंका या नक्कारा बजता रहता था, इसीलिए उनका नाम ‘डंका शाह’ पड़ा। वे केवल एक धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि एक अद्भुत संगठनकर्ता थे। उन्होंने ‘रोटी और कमल’ के जरिए गाँवों में बगावत का संदेश फैलाया। वे पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ ‘काफिर’ शब्द का इस्तेमाल कर भारतीयों को एकजुट किया।

हिंदू-मुस्लिम एकता के सूत्रधार इतिहास गवाह है कि अवध में 1857 की जंग हिंदू-मुस्लिमों ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी। मौलवी अहमदउल्ला शाह ने रायबरेली के राणा वेणीमाधो सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। फैजाबाद आजाद कराने के बाद उन्होंने राजा मान सिंह को वहां का शासक बनाया, जो उनकी सांप्रदायिक सौहार्द की सोच का सबसे बड़ा प्रमाण था।

जेल तोड़कर फिर संभाली कमान फरवरी 1857 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर फांसी की सजा सुनाई थी। लेकिन 8 जून 1857 को जब बगावत की लपटें फैजाबाद पहुंचीं, तो जनता ने जेल का फाटक तोड़कर अपने प्रिय नेता को रिहा करा लिया। इसके बाद उन्होंने चिनहट की लड़ाई और लखनऊ रेजीडेंसी के घेरे में अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। अंग्रेज इतिहासकार होम्स ने उन्हें उत्तर भारत में अंग्रेजों का सबसे जबरदस्त शत्रु’ करार दिया था।

विश्वासघात और शहादत जब अंग्रेज मौलवी साहब को रणभूमि में नहीं हरा पाए, तो उन्होंने उनके सिर पर 50,000 रुपये (1858 के दौर में एक विशाल राशि) का इनाम रखा। इसी लालच में पुवायां रियासत के राजा जगन्नाथ सिंह के भाई बलदेव सिंह ने 15 जून 1858 को धोखे से गोली चलाकर उनकी जान ले ली। अंग्रेजों ने दहशत फैलाने के लिए उनका कटा हुआ सिर शाहजहांपुर कोतवाली के फाटक पर लटका दिया।

मौन मज़ार की पुकार देशभक्तों ने जान जोखिम में डालकर उनका सिर वहां से उतारा और लोधीपुर गाँव के पास पूरे सम्मान के साथ दफन किया। आज भी खेतों के बीच उनकी मज़ार इस बात की गवाह है कि— उन्हीं फकीरों ने इतिहास बनाया है यहाँ, जिन पर इतिहास को लिखने के लिए वक्त न था।”

मौलवी अहमदउल्ला शाह फैजाबादी की कहानी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी की नींव में उन लोगों का खून भी शामिल है जिन्हें इतिहास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।

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