नफरत के समंदर में ‘एकता’ की मीठी बूंद: राजकोट के जंगलेश्वर में हिंदू-मुस्लिमों ने साथ लड़ी जंग; और शिकस्त खाई सरकार, हाई कोर्ट ने रद्द किया 1358 घरों को ढहाने का नोटिस

राजकोट: 7 हजार जिंदगियों पर मंडराया संकट टला! 'हिंदू-मुस्लिम एकता मंच' ने कानूनी लड़ाई जीत बचाए 1358 आशियाने। गुजरात हाई कोर्ट ने रद्द किया सरकारी नोटिस। जश्न के लिए मंदिर और दरगाह साथ पहुंचे दोनों धर्मों के लोग।

तारिक आज़मी 

डेस्क: जब इरादे नेक हों और एकता की नींव मजबूत हो, तो सबसे बड़ी सत्ता को भी कदम पीछे खींचने पड़ते हैं। गुजरात के राजकोट शहर के जंगलेश्वर और आस-पास के इलाकों में रहने वाले 7 हजार से अधिक लोगों के लिए सोमवार का दिन ‘नई जिंदगी’ जैसा रहा। गुजरात हाई कोर्ट ने प्रशासन द्वारा 1358 घरों को खाली करने और गिराने के नोटिस को रद्द कर दिया है।

क्या था मामला? दिसंबर 2025 में राजकोट प्रशासन ने जंगलेश्वर, बुद्ध नगर, राधाकृष्ण नगर और सिद्धार्थ नगर जैसे इलाकों में नोटिस जारी कर इन्हें ‘सरकारी जमीन पर अतिक्रमण’ बताया था। लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 202 के तहत लोगों को महज 7 दिनों के भीतर घर खाली करने का फरमान सुनाया गया था।

‘हिंदू-मुस्लिम एकता मंच’ की ताकत जंगलेश्वर क्षेत्र में जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, वहीं आस-पास की बस्तियों में हिंदू आबादी अधिक है। इस आपदा को देखते हुए दोनों धर्मों के लोग ‘हिंदू-मुस्लिम एकता मंच’ के बैनर तले एकजुट हुए।

  • साझा कानूनी लड़ाई: कानूनी प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया गया कि एकता बनी रहे। अदालतों में दायर याचिकाओं में जानबूझकर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों को मुख्य याचिकाकर्ता और सह-आवेदक बनाया गया।
  • इंसानियत का संदेश: इस मंच की नींव 2001 के भूकंप के समय पड़ी थी, जो आज भी सामाजिक कार्यों और संकट के समय चट्टान की तरह खड़ा है।

अदालत का फैसला और जश्न की तस्वीरें हाई कोर्ट द्वारा नोटिस रद्द किए जाने के बाद पूरा इलाका जश्न में डूब गया। एकता की मिसाल तब देखने को मिली जब मुस्लिम भाई अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ मंदिरों में प्रार्थना करने गए, और हिंदू भाई अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ हसनशाह पीर की दरगाह पर मत्था टेकने पहुंचे।

संविधान पर भरोसा और संयम एकता मंच के प्रमुख सदस्य आमदभाई नाई और सामाजिक कार्यकर्ता पुरुषोत्तम पिपरिया ने बताया कि प्रशासन ने भले ही इसे अतिक्रमण बताया, लेकिन लोगों ने 1954 और 1964 तक की टैक्स रसीदें, बिजली बिल और दस्तावेज पेश किए। उन्होंने कहा, “हमारी लड़ाई कानूनी थी और हमें संविधान पर पूरा भरोसा था। हमने तय किया था कि कोई कानून हाथ में नहीं लेगा, बस मिलकर अपने हक के लिए लड़ेंगे।”

आज के दौर में जहां सांप्रदायिक तनाव की खबरें आम हैं, जंगलेश्वर के लोग ‘खारे समुद्र में मीठे पानी की बूंदों’ की तरह हैं। यह जीत केवल 1358 घरों की नहीं, बल्कि उस ‘गंगा-यमुनी तहजीब’ की है जिसने एक बार फिर साबित कर दिया कि साथ मिलकर किसी भी मुश्किल को हराया जा सकता है।

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