रतलाम के पंचेवा गांव में ‘तालिबानी’ फरमान; प्रेम विवाह पर सामाजिक बहिष्कार, दूध-राशन बंद, पीड़ित बोले— “क्या संविधान से बड़ा है गांव का नियम?”

रतलाम: क्या संविधान से ऊपर है पंचायत का फ़रमान? पंचेवा गांव में प्रेम विवाह करने वालों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार। दूध-राशन पर रोक और मंदिर प्रवेश वर्जित। PNN24 की विशेष रिपोर्ट—संविधान और खाप वाली सोच के बीच पिसता एक परिवार।

शफी उस्मानी

रतलाम (मध्य प्रदेश): साल 2026 में भी क्या कोई समाज इतना पीछे जा सकता है कि दो बालिगों की पसंद पर पूरे परिवार का दाना-पानी बंद कर दे? रतलाम ज़िले के पंचेवा गांव से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जहाँ प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों और उनका समर्थन करने वालों के खिलाफ ‘सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार’ का ऐलान किया गया है।

मंदिर के सामने सुनाया गया ‘सजा’ का फैसला बीती 23 जनवरी को गांव के राम मंदिर के सामने एक जनसभा बुलाई गई। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में अरुण सांखला नामक व्यक्ति पंचायत और ग्रामीणों की मौजूदगी में यह ऐलान करते दिख रहे हैं कि लव मैरिज करने वालों को न दूध मिलेगा, न राशन और न ही मंदिर में प्रवेश। यह ‘फरमान’ उस संविधान को सीधी चुनौती है जो हर नागरिक को अपनी पसंद से जीवन साथी चुनने का अधिकार देता है।

बहिष्कार की मार झेल रहे दीनदयाल और मनीषा इस तुगलकी फरमान की ज़द में आए हैं दीनदयाल जाट और मनीषा पाटीदार। दोनों बालिग हैं और कोर्ट में कानूनी तौर पर शादी कर चुके हैं। दीनदयाल का आरोप है कि यह बहिष्कार सिर्फ ‘प्रेम विवाह’ के खिलाफ नहीं, बल्कि ‘अंतरजातीय शादी’ की वजह से है। दीनदयाल के चाचा निर्मल जाट ने इस शादी का समर्थन किया, तो उन्हें भी गांव से बाहर कर दिया गया। निर्मल कहते हैं, “मैं डर के मारे गांव नहीं जा पा रहा हूँ, वहां जाने पर हिंसा का खतरा है।”

प्रशासनिक कार्रवाई: सिर्फ 25 हजार का बॉन्ड? मामला गरमाने के बाद जिला कलेक्टर मीशा सिंह और एसपी अमित कुमार ने इसे नागरिक स्वतंत्रता का हनन बताया। पुलिस ने अरुण सांखला और 5 अन्य लोगों से 25-25 हजार रुपये का बॉन्ड भरवाया है कि वे भविष्य में ऐसा नहीं करेंगे। हालांकि, पीड़ित परिवार का कहना है कि प्रशासन की मदद केवल कागजों तक सीमित है और वे आज भी गांव के बाहर ‘असहाय’ जीवन जीने को मजबूर हैं।

सरपंच की दलील: ‘मर्यादा बचाने के लिए जरूरी’ गांव के सरपंच योगेश मीणा और पंचों का तर्क है कि पिछले एक साल में 6-7 जोड़ों के भागकर शादी करने से गांव की ‘इज्जत’ मिट्टी में मिल गई है। वे इसे सामाजिक व्यवस्था बचाने का तरीका बता रहे हैं। सवाल यह है कि क्या किसी की इज्जत बचाने के लिए किसी के बुनियादी मानवाधिकारों और आजीविका (दूध-राशन) को छीनना जायज है?

जिस शादी को देश की पुलिस, कोर्ट और कानून वैध मानते हैं, उसे अवैध घोषित करने का हक इन स्वयंभू पंचायतों को किसने दिया? क्या प्रशासन का 25 हजार का बॉन्ड उन लोगों के हौसले पस्त कर पाएगा जो खुलेआम बहिष्कार और हिंसा की धमकी दे रहे हैं?

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