नफरत की रील, सिस्टम की ढील और एक मज़दूर की बेबसी: क्या ‘देवभूमि’ में अब इबादत पर भी पहरा है?

रुद्रपुर से आया वह वीडियो सिर्फ एक राजमिस्त्री मोहम्मद शाहिद की पिटाई का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में गहरे तक पैठ बना चुके उस 'नफरती वायरस' का एक्सरे है, जो अब रील और लाइक्स के लिए किसी की गरिमा को तार-तार करने से भी नहीं हिचकता।

तारिक आज़मी

डेस्क: रुद्रपुर से आया वह वीडियो सिर्फ एक राजमिस्त्री मोहम्मद शाहिद की पिटाई का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में गहरे तक पैठ बना चुके उस ‘नफरती वायरस’ का एक्सरे है, जो अब रील और लाइक्स के लिए किसी की गरिमा को तार-तार करने से भी नहीं हिचकता।

  1. इबादत बनाम नफरत का तमाशा 52 वर्षीय शाहिद पिछले 22 साल से पत्थर जोड़कर लोगों के घर बना रहे हैं। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने खाली मैदान में, माली की इजाजत लेकर खुदा को याद करने के लिए सिर झुकाया। लेकिन अरविंद शर्मा जैसे ‘नफरती चिंटू’ के लिए यह कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि अपनी मर्दानगी और रील के लिए ‘कंटेंट’ बनाने का मौका था। जब डंडे चलते हैं और जबरन नारे लगवाए जाते हैं, तो वह प्रहार सिर्फ शाहिद की पसलियों पर नहीं, बल्कि भारत के संविधान की प्रस्तावना पर होता है।
  2. रील संस्कृति और गिरता मानवीय मूल्य हैरत की बात यह है कि हमलावर अकेला नहीं था, वह अपने साथ एक ‘कैमरामैन’ लेकर आया था। यह दर्शाता है कि आज नफरत ‘आकस्मिक’ (Accidental) नहीं, बल्कि ‘सुनियोजित’ (Planned) है। सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटने के लिए एक बुज़ुर्ग और कमज़ोर मज़दूर को ढाल बनाना कायरता की पराकाष्ठा है।
  3. पुलिस की ‘नोटिस वाली’ थ्योरी पर सवाल एसएसपी साहब का यह कहना कि ‘7 साल से कम की सज़ा है इसलिए सिर्फ नोटिस देंगे’, तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन नैतिक रूप से खोखला लगता है। जब वीडियो में अपराध साफ़ दिख रहा हो, जब सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश खुलेआम हो रही हो, तब कानून की बारीकियों के पीछे छिपना अपराधियों के मनोबल को सातवें आसमान पर ले जाता है। क्या पुलिस को तब तक इंतज़ार करना चाहिए जब तक कि यह नफरत किसी की जान न ले ले?
  4. दो व्यक्तियों का विवाद या वैचारिक हमला? सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा इसे ‘दो व्यक्तियों का विवाद’ कहना सच से आँखें मूंदने जैसा है। अगर यह साधारण विवाद होता, तो इसमें धार्मिक नारे और वीडियो वायरल करने का एंगल नहीं होता। यह एक खास वर्ग को डराने और संदेश देने की कोशिश है, जिसे राजनीतिक चश्मे से देखना बंद करना होगा।

शाहिद आज डरे हुए हैं। उन्हें पसलियों के दर्द से ज्यादा फिक्र इस बात की है कि इलाज के पैसे कहाँ से आएंगे और काम बंद रहा तो घर कैसे चलेगा। ‘देवभूमि’ की परंपरा अतिथि देवो भव: और शांति की रही है। अगर हम आज चुप रहे, तो कल यह नफरत किसी और के दरवाजे पर दस्तक देगी। प्रशासन को चाहिए कि वह ‘नोटिस-नोटिस’ का खेल बंद कर ऐसी सख्त कार्रवाई करे कि भविष्य में कोई रील बनाने के लिए किसी की आस्था का मज़ाक न उड़ा सके।

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