ट्रंप की ‘सत्ता परिवर्तन’ की जिद: क्या ईरान बनेगा अमेरिका की चौथी ऐतिहासिक भूल?
"इतिहास गवाह है कि बमबारी से सत्ता तो बदली जा सकती है, लेकिन व्यवस्था नहीं। अफगानिस्तान में 20 साल बाद भी वही तालिबान सत्ता में है जिसे मिटाने के लिए अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। लीबिया आज भी गद्दाफी के बाद एक 'नाकाम राष्ट्र' (Failed State) बनकर रह गया है। ट्रंप की ईरान नीति भी उसी खतरनाक रास्ते पर है, जहाँ जीत का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है, सिर्फ विनाश का अंदेशा है।"

तारिक आज़मी
इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन कभी-कभी उसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जो ‘बड़ा सैन्य अभियान’ शुरू किया है, वह दशकों पुरानी उसी अमेरिकी मानसिकता का हिस्सा है जिसे ‘रिजीम चेंज’ या ‘सत्ता परिवर्तन’ कहा जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रंप ने ईरान को इराक, लीबिया और अफगानिस्तान जैसा समझने की भारी भूल कर दी है?
1. अफगानिस्तान: 20 साल की जंग और वही अंजाम
अफगानिस्तान में अमेरिका का अनुभव दुनिया के लिए एक सबक है। तालिबान को खत्म करने की कसम खाकर अमेरिका ने हमला किया, खरबों डॉलर बहाए और हजारों सैनिकों की बलि दी। परिणाम? दो दशक बाद अमेरिका उसी तालिबान को सत्ता सौंपकर पीछे हट गया जिसे वह मिटाना चाहता था। यह ‘सत्ता परिवर्तन’ की सबसे बड़ी शिकस्त थी।
2. इराक और लीबिया: विनाशकारी विरासत
- इराक: ‘शॉक एंड ऑव’ (Shock and Awe) की रणनीति के तहत इराक को खंडहर बना दिया गया। लाखों इराकियों की जान गई, लेकिन वहां जो लोकतंत्र लाने का वादा था, वह आज भी हिंसा और अस्थिरता के मलबे में दबा हुआ है।
- लीबिया: बिना ज़मीनी सेना के गद्दाफी को हटाने का प्रयास सफल तो रहा, लेकिन लीबिया आज भी अराजकता और विभाजन की आग में जल रहा है।
3. ईरान: क्यों यह पिछली गलतियों से अलग और घातक है?
ईरान न तो इराक की तरह थका हुआ देश है और न ही अफगानिस्तान की तरह केवल कबीलाई ताकतों में बंटा हुआ। ईरान के पास एक मजबूत ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ (हुती, हिजबुल्लाह) और परिष्कृत मिसाइल तकनीक है। ट्रंप जिस ‘सत्ता परिवर्तन’ की जिद पर अड़े हैं, उसके पीछे तीन नाकामियां खड़ी हैं। जब ईरान की धरती पर बम बरसते हैं और स्कूलों में मासूम बच्चों की लाशें बिछती हैं, तो यह उस ‘विश्वासघात’ की पुष्टि करता है जिसका जिक्र ईरान के विदेश मंत्रालय ने किया है। परमाणु वार्ता के मेज पर बैठकर पीछे से हमला करना अमेरिका की कूटनीतिक साख को हमेशा के लिए खत्म कर सकता है।
निष्कर्ष: अराजकता का नया केंद्र
पूर्व इजरायली शांति वार्ताकार डैनियल लेवी ने सही कहा है कि इजरायल और अमेरिका मध्य पूर्व में ‘अराजकता’ फैला रहे हैं। सत्ता परिवर्तन के पिछले तीनों प्रयासों ने साबित किया है कि अमेरिका सत्ता तो बदल सकता है, लेकिन शांति और व्यवस्था स्थापित करने में वह पूरी तरह विफल रहा है। अगर ईरान के मामले में भी यही हुआ, तो इस बार इसकी आग केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लेगी।
तारिक आज़मी
प्रधान सम्पादक
तुलनात्मक विश्लेषण: अमेरिकी ‘सत्ता परिवर्तन‘ (Regime Change) की विफलता
नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि पिछले तीन प्रयासों में अमेरिका ने क्या खोया और अंततः परिणाम क्या रहा। यह पाठक को यह समझने में मदद करेगा कि क्या ईरान के मामले में भी वही इतिहास दोहराया जा रहा है।
| देश | युद्ध की अवधि | घोषित लक्ष्य | जमीनी हकीकत/परिणाम | वर्तमान स्थिति |
| अफगानिस्तान | 2001 – 2021 (20 वर्ष) | तालिबान का खात्मा और लोकतंत्र | $2.3$ ट्रिलियन डॉलर खर्च, 2400+ अमेरिकी सैनिकों की मौत | तालिबान की वापसी, मानवीय संकट |
| इराक | 2003 – 2011 | सद्दाम हुसैन को हटाना (WMDs का बहाना) | लाखों नागरिकों की मौत, ISIS का उदय | अस्थिरता और भ्रष्टाचार, क्षेत्रीय असुरक्षा |
| लीबिया | 2011 (हवाई हमला) | गद्दाफी शासन का अंत | देश दो हिस्सों में बंटा, कोई केंद्रीय नियंत्रण नहीं | गृहयुद्ध और अराजकता, चरमपंथ का गढ़ |
| ईरान | 2026 (जारी) | शासन परिवर्तन (Regime Change) | स्कूलों पर हमले, 201+ मौतें (शुरुआती आंकड़े) | अनिश्चितता और महायुद्ध का खतरा |













