नफ़रत के दौर में मोहब्बत की मिसाल: राजस्थान के 5 हिंदू भाइयों ने ईदगाह के लिए दान की अपनी पुश्तैनी ज़मीन
सीकर के गुहाला गाँव के सैनी परिवार ने पेश की सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी तस्वीर; न पैसे लिए, न हिचकिचाहट दिखाई, बोले— "हमारे लिए सब बराबर हैं."

तारिक आज़मी
राजस्थान के सीकर ज़िले के नीमकाथाना इलाके का गुहाला गाँव इन दिनों पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। उदयपुरवाटी मार्ग पर स्थित करीब सात हज़ार की आबादी वाले इस गाँव में पाँच हिंदू भाइयों ने वह कर दिखाया है, जिसकी गूँज दूर-तक सुनाई दे रही है। भोपाल राम सैनी और उनके भाइयों—पूरणमल, भीमाराम और अन्य—ने अपनी उपजाऊ ज़मीन का एक हिस्सा गाँव की ईदगाह के विस्तार के लिए दान कर दिया है।
जगह की कमी बनी वजह, प्यार ने निकाला रास्ता
गाँव के बुजुर्गों के अनुसार, ईदगाह की नींव सदियों पुरानी है, लेकिन समय के साथ नमाज़ियों की संख्या बढ़ती गई। ईद के मौके पर आसपास के कई गाँवों के लोग यहाँ जुटते हैं, जिससे जगह कम पड़ जाती थी। 65 वर्षीय हाजी मोहम्मद तौफ़ीक बताते हैं कि उन्होंने सैनी भाइयों से ज़मीन के लिए बात की थी।
“हमने झोली फैलाकर ज़मीन मांगी थी, और उन्होंने दरियादिली दिखाते हुए बिना किसी कीमत के इसे हमारे नाम कर दिया।” – हाजी मोहम्मद तौफ़ीक
“पैसे नहीं, प्यार चाहिए”
45 वर्षीय पूरणमल सैनी बताते हैं कि जब मुस्लिम भाइयों ने ज़मीन की कीमत चुकाने की पेशकश की, तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने न केवल ज़मीन दी, बल्कि ईदगाह की बाउंड्री वॉल बनवाने में भी खुद हाथ बँटाया। नींव खोदने से लेकर पत्थर लगाने तक, ये हिंदू भाई कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।
विरोध के बावजूद अडिग रहा फैसला
पूरणमल ने स्वीकार किया कि इस फैसले के बाद कुछ रिश्तेदारों और बाहरी लोगों के फोन आए। लोगों ने सवाल किया कि “मुसलमानों को ज़मीन क्यों दी? मंदिर के लिए क्यों नहीं?” इस पर भाइयों का जवाब बेहद सादगी भरा और कड़ा था: “अगर कोई हिंदू भी मंदिर के लिए ज़मीन मांगेगा, तो उसे भी देंगे। हमारे लिए सब बराबर हैं।”
गुहाला: जहाँ हवेलियाँ ही नहीं, रिश्ते भी पुराने हैं
गुहाला गाँव का इतिहास भाईचारे की कहानियों से भरा है। यहाँ 25% मुसलमान, 25% सैनी और बाकी अन्य समुदायों के लोग ‘छत्तीस कौम’ के साथ मिलकर रहते हैं। बुजुर्ग भीमा राम याद करते हैं कि कैसे पुराने दौर में मुसलमान भाई फेरी से लौटते वक्त बेझिझक हिंदू घरों में रात गुज़ारते थे।
एक बड़ा संदेश
अब्दुल रशीद और मोहम्मद ईशाक कांवट जैसे ग्रामीणों का मानना है कि शेखावाटी की इस धरती ने एक बार फिर राजस्थान की असली संस्कृति का परिचय दिया है। जहाँ देश में अक्सर धार्मिक लकीरें गहरी होती दिखती हैं, वहाँ गुहाला की यह कहानी साबित करती है कि इंसानियत आज भी ज़िंदा है।











