तारिक आज़मी की मोरबतिया: ‘वाराणसी के अस्पतालों की व्यवस्था पर काका बोले— “बबुआ, बजट तो हाथी जैसा है, पर वेंटिलेटर चूहे जैसा भी नहीं।”
तारिक आज़मी की 'मोरबतियाँ'— वाराणसी के सरकारी अस्पतालों में 'राम भरोसे' इलाज! काका बोले— "बबुआ, बजट तो हाथी जैसा है, पर वेंटिलेटर चूहे जैसा भी नहीं।" स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली पर काका का 'सर्जिकल स्ट्राइक'। PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): आज सुबह काका बड़े उदास थे। न रजनीगंधा की तलब थी, न काकी से नोकझोंक का इरादा। हाथ में मोबाइल था और आँखें नम थीं। खबर पढ़ रहे थे—हरीश राणा की, जिसने 11 साल कोमा में रहने के बाद ‘इच्छा मृत्यु’ (Passive Euthanasia) को गले लगा लिया। काका ने आह भरते हुए पूछा— “बबुआ, ई बताओ कि जिस देश में “विश्वगुरु” बनने का डंका बजता हो, वहाँ एक बाप को अपने जवान बेटे के लिए मौत मांगनी पड़े, क्या यही विकास है? मकान बिक गया, जेवर बिक गए, पर सिस्टम ने एक वेंटिलेटर तक नहीं दिया?”

1. बजट का ‘हाथी’ और वेंटिलेटर का ‘चूहा’
काका, सरकारें हर साल स्वास्थ्य बजट के ऐसे आंकड़े पेश करती हैं जैसे कल ही ‘अमरता का अमृत’ बंटने लगेगा।
- वाराणसी का हाल: करोड़ों का फंड आता है, पर यहाँ के सरकारी अस्पतालों में खुद का एक वेंटिलेटर ढूंढना ‘चाँद पर पानी’ खोजने जैसा है।
- पूर्वांचल का दर्द: यहाँ न्यूरोसर्जरी तो दूर, एक सीटी स्कैन के लिए भी गरीब को चप्पलें घिसनी पड़ती हैं। अगर वेंटिलेटर मिल भी जाए, तो पता चलता है कि उसे चलाने वाला ऑपरेटर ‘तबादले’ पर है या बिजली गुल है।
2. “रेफर-रेफर” का खेल
काका बोले— “बबुआ, हम जब भी शिवप्रसाद गुप्त या मंडलीय अस्पताल जाते हैं, तो डॉक्टर पहले हमें देखते हैं या हमारी जेब? देखते ही कहते हैं— ‘बीएचयू ले जाओ या प्राइवेट में भर्ती करो’।”
मैंने कहा— “काका, यही तो असली “रेफरल मॉडल” है! सरकारी अस्पतालों का काम अब केवल “ट्रैफिक पुलिस” जैसा रह गया है—मरीज़ को रास्ता दिखाना। गरीब आदमी को ‘आयुष्मान कार्ड’ थमा दिया जाता है, पर जब वो प्राइवेट अस्पताल जाता है, तो उसे ‘बेड खाली नहीं है’ का बोर्ड दिखा दिया जाता है।”

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3. काकी की “घरेलू डॉक्टरी” बेहतर है!
काका ने कड़वाहट से कहा— “इससे तो भला तुम्हारी काकी है, कम से कम काढ़ा पिलाकर और डांट लगाकर आधा बुखार तो वैसे ही उतार देती है। सरकारी अस्पताल जाओ तो ज़िंदा आदमी भी अपनी अर्थी का ‘कोटेशन’ मांगने लगता है।”
काका की बात में दर्द था। जब तक पूर्वांचल के अस्पतालों में वेंटिलेटर और स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं होंगे, तब तक मध्यमवर्ग ऐसे ही कर्ज के जाल में फंसकर ‘इच्छा मृत्यु’ के रास्ते तलाशता रहेगा।
4. काका का निष्कर्ष
जाते-जाते काका ने एक बड़ी पते की बात कही— “बबुआ, इस देश में मंदिर-मस्जिद के लिए चंदा और भीड़ तो मिल जाएगी, पर एक गरीब के वेंटिलेटर के लिए न कोई नेता आगे आएगा और न कोई चंदा देगा। विकास का चश्मा उतारकर देखो, तो दिखेगा कि हम “डिजिटल इंडिया” में जी रहे हैं, पर इलाज “पाषाण काल” जैसा है।”
📊 काका का ‘हॉस्पिटल मीटर’: बजट बनाम हकीकत (Kaka’s Health Index)
| सुविधा | सरकारी दावा (विज्ञापन) | ज़मीनी हकीकत (मरीज़ का हाल) |
| वेंटिलेटर | हर बेड पर उपलब्ध | ‘धूल’ फांकती मशीनें या स्टाफ की कमी |
| मुफ्त दवाएं | 100% वितरण | “बाहर की पर्ची” का बोलबाला |
| जांच (MRI/CT) | आधुनिक मशीनें | लम्बी ‘तारीख’ |
| इलाज का खर्च | शून्य | मकान, दुकान और ज़मीर सब बिक जाता है |











