‘बंगाल का रण 2026: पांच राज्यों में चुनाव, पर टिकी हैं सबकी निगाहें सिर्फ कोलकाता पर; क्या दीदी का “करिश्मा” रोक पाएगा अमित शाह का “मिशन 200”?’
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: क्या ढहेगा ममता का 'अजेय' किला या बीजेपी रचेगी इतिहास? जानिए वे 5 बड़े कारण जो बंगाल के चुनाव को केरल, तमिलनाडु और असम से बिल्कुल अलग और बेहद दिलचस्प बनाते हैं। राजनीतिक हिंसा से लेकर मतदाता सूची विवाद तक—पूरी पड़ताल। PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

आफताब फारुकी
कोलकाता/नई दिल्ली (PNN24 News): अगले महीने देश के चार राज्यों—असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु—और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में लोकतंत्र का उत्सव शुरू होने जा रहा है। हालांकि, चुनावी तारीखों के ऐलान के साथ ही यह साफ हो गया है कि राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा हलचल ‘पश्चिम बंगाल’ को लेकर है। इस बार बंगाल में मतदान केवल दो चरणों (23 और 29 अप्रैल) में सिमट गया है, लेकिन सियासी पारा सातवें आसमान पर है।

1. राजनीतिक हिंसा का ‘अमिट’ साया
बंगाल में चुनाव का मतलब सिर्फ वोट डालना नहीं, बल्कि वर्चस्व की लड़ाई है। यहाँ ‘जो जीता सब कुछ उसी का’ (Winner Takes All) वाली संस्कृति हावी है। सीमित कृषि भूमि और सघन आबादी के कारण संसाधनों के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा अक्सर खूनी संघर्ष में बदल जाती है। बोगटुई से लेकर नंदीग्राम तक, हिंसा का इतिहास यहाँ की राजनीति की कड़वी सच्चाई है।
2. ‘एसआईआर’ (SIR) और पहचान का संकट
मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया (Special Intensive Revision) ने बंगाल में जितना बवाल मचाया है, उतना कहीं और नहीं दिखा। सीमावर्ती राज्य होने के कारण यहाँ शरणार्थियों और ‘मिट्टी के बेटे’ की पहचान का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। ममता बनर्जी ने इसे नागरिक अधिकारों की लड़ाई बनाकर चुनावी मैदान में भावनात्मक बढ़त लेने की कोशिश की है।
3. ममता बनर्जी: विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा
बीजेपी के लिए ममता बनर्जी आज भी देश की सबसे बड़ी क्षेत्रीय चुनौती हैं। 1984 से राजनीति के शीर्ष पर रहीं ममता का कद शरद पवार या अखिलेश यादव जैसे नेताओं से कहीं ऊपर माना जाता है। बीजेपी के तमाम प्रयासों के बावजूद, बंगाल में आज भी उनके मुकाबले कोई ‘भरोसेमंद चेहरा’ खड़ा नहीं हो पाया है, जो इस लड़ाई को सीधे ‘मोदी बनाम ममता’ बना देता है।
4. बीजेपी का ‘आखरी किला’ और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत
बीजेपी के लिए बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक वैचारिक प्रतिष्ठा का विषय है। जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मस्थली होने के नाते, यहाँ सत्ता में आना बीजेपी का पुराना सपना है। 2021 की हार के बाद, 2026 का यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के लिए ‘मिशन बंगाल’ को पूरा करने का आखिरी मौका माना जा रहा है।
5. सत्ता का ‘दीर्घकालिक’ पैटर्न: बदलाव की धीमी रचयिता
बंगाल के मतदाता का मिजाज देश के अन्य राज्यों से अलग है। यहाँ केरल की तरह हर पांच साल में सरकार नहीं बदलती। यहाँ कांग्रेस ने 30 साल, वाम मोर्चे ने 34 साल और अब तृणमूल ने 15 साल पूरे कर लिए हैं। सवाल यह है कि क्या बंगाल का मतदाता एक बार फिर पुरानी पार्टी पर भरोसा जताएगा या दशकों बाद किसी नई विचारधारा (बीजेपी) को मौका देगा?
📊 बंगाल चुनाव 2026: मुख्य आंकड़े (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| कुल चरण | 02 (23 अप्रैल और 29 अप्रैल) |
| मुख्य प्रतिद्वंद्वी | तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाम बीजेपी (BJP) |
| मुख्य मुद्दे | राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार, SIR विवाद, स्थानीय पहचान |
| पिछला परिणाम (2021) | TMC- 213, BJP- 77, अन्य- 04 |











