‘प्रयागराज: स्टेशन वाली “संगमरमर मस्जिद” का मामला पहुँचा हाईकोर्ट; रेलवे के “खाली करने के नोटिस” को कमेटी ने दी चुनौती; क्या बचेगा मस्जिद का वजूद?’

प्रयागराज रेलवे स्टेशन के पास स्थित 'संगमरमर वाली मस्जिद' का मामला पहुँचा इलाहाबाद हाईकोर्ट। रेलवे के बेदखली नोटिस के खिलाफ मस्जिद कमेटी ने दायर की याचिका। वक्फ बोर्ड में दर्ज और प्राचीन होने का दिया हवाला। अब हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी सबकी नज़र। PNN24 की विशेष कानूनी रिपोर्ट।

तारिक आज़मी

PNN24 News: प्रयागराज रेलवे स्टेशन के गेट नंबर-1 के बगल में स्थित ऐतिहासिक और चर्चित ‘संगमरमर वाली मस्जिद’ को लेकर चल रहा विवाद अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की चौखट पर पहुँच गया है। मस्जिद कमेटी ने रेलवे द्वारा जारी किए गए ‘बेदखली और खाली करने के नोटिस’ के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। इस याचिका के बाद अब पूरे शहर की नज़रें कोर्ट के आने वाले फैसले पर टिक गई हैं।

1. क्या है याचिका में कमेटी का तर्क?

मस्जिद कमेटी की ओर से दायर याचिका में मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को आधार बनाया गया है:

  • प्राचीनता: याचिका में कहा गया है कि यह मस्जिद अत्यंत प्राचीन है और स्टेशन के विस्तार से बहुत पहले से अस्तित्व में है।
  • वक्फ संपत्ति: कमेटी का दावा है कि यह मस्जिद यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में विधिवत दर्ज है, इसलिए इसके कानूनी स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
  • प्रशासनिक नोटिस: रेलवे द्वारा हाल ही में मस्जिद खाली करने का नोटिस दिया गया था, जिसे कमेटी ने ‘अवैध’ बताते हुए कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है।

2. रेलवे का पक्ष और विवाद की जड़

सूत्रों के अनुसार, रेलवे स्टेशन के सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास (Redevelopment) योजना के तहत स्टेशन परिसर के आसपास के अतिक्रमण और संरचनाओं को हटाने की प्रक्रिया चल रही है। इसी क्रम में रेलवे प्रशासन ने मस्जिद को नोटिस जारी किया था। रेलवे का तर्क है कि यह ज़मीन रेलवे की संपत्ति के दायरे में आती है।

3. कोर्ट के फैसले का इंतज़ार

इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल इस याचिका पर जल्द ही सुनवाई होने की उम्मीद है। शहर के संवेदनशील इलाकों में शामिल इस स्थल को लेकर प्रशासन भी अलर्ट पर है। कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि स्टेशन परिसर की यह पहचान सुरक्षित रहेगी या रेलवे का मास्टर प्लान प्रभावी होगा।


📝 विशेष कॉलम: मोरबत्तियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

Tariq Azmi (तारिक आज़मी)

काका का नज़रिया:

“बबुआ, स्टेशन की रेल और मस्जिद की सफें दोनों ही शहर की रफ़्तार और सुकून का हिस्सा हैं; अब देखना ई है कि कानून की तराजू में ‘विकास’ भारी पड़ता है या ‘विरासत’!”

आज प्रयागराज की इस चर्चित मस्जिद और हाईकोर्ट की याचिका पर अस्सी घाट की अड़ी पर काका ने बड़े ही सधे हुए अंदाज़ में चर्चा की।

काका बोले: “बबुआ, प्रयागराज का स्टेशन और वो सफ़ेद संगमरमर की मस्जिद, दोनों बरसों से एक-दूसरे के पड़ोसी हैं। अब ‘विकास’ की पटरी मस्जिद के वजूद की तरफ मुड़ रही है। कमेटी कोर्ट चली गई है, ई अच्छा किया। जब बात ‘वक्फ’ और ‘प्राचीनता’ की हो, तो फैसला कागज़ों की बुनियाद पर ही होना चाहिए। मस्जिद के नोटिस की खबर ने शहर के गलियारों में चर्चा तो गरम कर दी है।”

मैंने पूछा— “काका, क्या वक्फ में दर्ज होने से मामला सुलझ जाएगा?”

काका का जवाब: “बबुआ, कानून की अपनी पेचीदगियाँ होती हैं। हाईकोर्ट देखेगा कि ज़मीन का असली मालिक कौन है और दस्तावेज़ क्या कहते हैं। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, आस्था और व्यवस्था के बीच का रास्ता हमेशा अदालत ही निकालती है’। अब नज़रें हाईकोर्ट की बेंच पर हैं, जो भी होगा वो नज़ीर बनेगा।”

📊 विवाद: एक नज़र में (Legal Summary)

विवरण जानकारी
मस्जिद का नाम संगमरमर वाली मस्जिद (स्टेशन गेट के पास)
विवाद का पक्ष रेलवे प्रशासन बनाम मस्जिद कमेटी
मुख्य दावा मस्जिद प्राचीन है और वक्फ बोर्ड में दर्ज है
ताज़ा स्थिति इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल
संभावित आधार धार्मिक संरचना के संरक्षण और वक्फ एक्ट के प्रावधान

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