‘रूस की जंग में बुझ गया रामपुर का “चिराग”: 7 महीने बाद ताबूत में घर लौटा शावेद; फर्नीचर के काम के लिए गया था विदेश, सेना में भर्ती और मौत की खबर ने खड़े किए “साजिश” के सवाल!’
रामपुर: 7 महीने बाद वतन लौटा शावेद का शव, रूस-यूक्रेन युद्ध की भेंट चढ़ा मसवासी का लाल। फर्नीचर के काम के लिए गया था विदेश, धोखे से रूसी सेना में भर्ती करने की आशंका। दिल्ली एयरपोर्ट से एम्बुलेंस पहुँचते ही फतेहगंज में मचा कोहराम। क्या मजबूर भारतीय युवाओं को बनाया जा रहा 'कैनन फॉडर'? PNN24 की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट।

गौरव जैन
मसवासी, रामपुर (PNN24 News): उत्तर प्रदेश के रामपुर जनपद के मसवासी क्षेत्र में शनिवार का सूरज मातम की चादर ओढ़कर निकला। ग्राम पंचायत भूबरा मुस्तेकम के मझरा फतेहगंज निवासी शावेद (22 वर्ष) का शव करीब सात महीने बाद जब गांव पहुँचा, तो हजारों की भीड़ की आँखें नम हो गईं। यह केवल एक शव की वतन वापसी नहीं थी, बल्कि उन अनसुलझे सवालों का पुलिंदा था जो रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारतीय युवाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़ा कर रहे हैं।
1. फर्नीचर का सपना और सेना की ‘अनचाही’ वर्दी
शावेद के पिता दूल्हे हसन, जो दूध की डेयरी चलाते हैं, ने बताया कि उनका बेटा करीब 9 महीने पहले स्टील फर्नीचर के काम के लिए रूस गया था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था:
- 5 सितंबर 2025: शावेद ने फोन पर बताया कि वह सेना में भर्ती हो गया है।
- 12 सितंबर 2025: रूसी दस्तावेजों के अनुसार, ट्रेनिंग या ऑपरेशन के दौरान उसकी मौत हो गई।
- 7 महीने का इंतज़ार: परिवार को मौत की खबर बहुत देर से मिली और शव को भारत लाने में लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।
2. दिल्ली एयरपोर्ट पर तीन भारतीयों के पहुँचे शव
शनिवार सुबह दिल्ली एयरपोर्ट पर रूस से तीन भारतीय युवकों के शव लाए गए, जिनमें एक शावेद का था, दूसरा जम्मू-कश्मीर और तीसरा हरियाणा के युवक का। दोपहर करीब पौने दो बजे जब एम्बुलेंस फतेहगंज पहुँची, तो पूरे इलाके में चीख-पुकार मच गई। शावेद अपने पीछे भाई नावेद, शुएब और बहन सिम्मी को छोड़ गया है।
3. साजिश या मजबूरी? निष्पक्ष जांच की मांग
शावेद की मौत ने गांव में कई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। ग्रामीणों और परिजनों का आरोप है कि शावेद को बहला-फुसलाकर या दबाव बनाकर रूसी सेना में भर्ती कराया गया होगा। आखिर एक फर्नीचर कारीगर महज 7 दिनों के भीतर सेना में भर्ती होकर जान कैसे गंवा बैठा? परिवार अब सरकार से इस मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।
”हरियाणा, कश्मीर और अब रामपुर… गरीब का बच्चा जहाँ भी मरे, खबर दो दिन बाद पुरानी हो जाती है। 70 हज़ार डॉलर का इनाम तो पायलट पर रखा गया है, पर इन पैदल सैनिकों की जान की कीमत क्या है? शावेद का छोटा भाई और बहन अब किसके सहारे जिएंगे? काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया से पहले उन हाथों को हुनर और काम दो, वरना हमारे नौजवान ऐसे ही पराई जंग में शहीद होते रहेंगे’।












