‘इस्लामाबाद में “ईगो” और “अस्तित्व” की जंग: ट्रंप को चाहिए युद्ध से सम्मानजनक विदाई, तो ईरान को चाहिए वजूद की गारंटी; क्या “होर्मुज़” की चाभी खोलेगी शांति का दरवाज़ा?’

इस्लामाबाद में 'शांति की बिसात': क्या ट्रंप की 15-सूत्रीय योजना और ईरान का पलटवार युद्ध रोक पाएंगे? होर्मुज़ स्ट्रेट को खोलना बना मुख्य मुद्दा। ट्रंप की चुनावी मजबूरी बनाम ईरान की अटूट सैन्य क्षमता। मध्य-पूर्व की बदलती जियोपॉलिटिक्स पर PNN24 की विशेष इन-डेप्थ रिपोर्ट।

फारुख हुसैन

PNN24 News: 28 फरवरी को शुरू हुआ अमेरिका-ईरान युद्ध अब एक ऐसे मुकाम पर है जहाँ न तो अमेरिका अपनी ‘पूर्ण जीत’ का दावा कर पा रहा है और न ही ईरान पूरी तरह घुटनों पर है। शनिवार को इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत केवल एक युद्धविराम नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व के नए भविष्य की पटकथा लिखेगी।

1. ट्रंप की मजबूरी: चुनाव, शाही यात्रा और तेल की कीमतें

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही अपनी ‘जीत’ घोषित कर दी हो, लेकिन वास्तविकता उन्हें समझौते की मेज पर खींच लाई है।

  • घरेलू दबाव: अमेरिका में गर्मियों की छुट्टियाँ नज़दीक हैं और ट्रंप चाहते हैं कि पेट्रोल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर पर आ जाएँ।
  • डिप्लोमैटिक कैलेंडर: किंग चार्ल्स की राजकीय यात्रा और शी जिनपिंग के साथ शिखर सम्मेलन से पहले ट्रंप इस युद्ध के मलबे को साफ करना चाहते हैं। नवंबर के मध्यावधि चुनाव उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा हैं।

2. ईरान का ‘सरप्राइज़’: सत्ता का टिके रहना

अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना था कि सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई और उनके परिवार की मौत के बाद ईरानी सत्ता ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

  • मज़बूत शासन: सर्वोच्च नेता के बेटे मोजतबा ख़ामेनेई की चोटों की अटकलों के बीच भी ईरान ने अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमता को बरकरार रखा है।
  • होर्मुज़ का हथियार: ईरान ने दिखा दिया है कि ‘होर्मुज़ स्ट्रेट’ को बंद करके वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की नब्ज़ दबा सकता है—एक ऐसी सामरिक बढ़त जिसे ट्रंप ने शायद कम करके आंका था।

3. 15 बनाम 10: प्रस्तावों का टकराव

बातचीत के लिए मेज पर दो परस्पर विरोधी सूचियाँ हैं:

  • ट्रंप की 15-सूत्रीय योजना: लीक हुए दस्तावेज़ों के अनुसार, यह शांति से ज़्यादा ईरान के ‘आत्मसमर्पण’ का दस्तावेज़ नज़र आता है।
  • ईरान की 10-सूत्रीय योजना: इसमें वे माँगें हैं जिन्हें वॉशिंगटन अतीत में कई बार ठुकरा चुका है।
  • पाकिस्तानी मध्यस्थ की चुनौती: दोनों पक्षों के बीच तालमेल बिठाना ‘नामुमकिन’ जैसा लग रहा है, क्योंकि भरोसे का नामोनिशान नहीं है।

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