‘APCR का बड़ा दावा: बंगाल में चुनाव बाद की हिंसा “सुनियोजित सांप्रदायिक हमला”; मस्जिदों, मीट व्यापार और मुस्लिम पहचान को बनाया गया निशाना!’
APCR की रिपोर्ट का खुलासा: पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा सामान्य नहीं, बल्कि मुस्लिमों के खिलाफ 'सुनियोजित सांप्रदायिक हमला' था। 8 जिलों में मस्जिदों, व्यापार और पहचान को निशाना बनाने का दावा। PNN24 की विशेष पड़ताल।

ईदुल अमीन
कोलकाता (PNN24 News): एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल Rights (APCR) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों के बाद हुई हिंसा पर अपनी तथ्यात्मक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में मुस्लिमों, उनकी संपत्तियों और धार्मिक स्थलों को एक योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया गया है। संगठन ने इसे सामान्य चुनावी हिंसा मानने से इनकार करते हुए “लक्षित सांप्रदायिक और राजनीतिक उत्पीड़न” (Targeted Communal and Political Persecution) करार दिया है।
1. 8 जिलों में 34 गंभीर घटनाएं
रिपोर्ट में 4 मई से 7 मई 2026 के बीच की अवधि को अत्यंत संवेदनशील बताया गया है। इस दौरान कूचबिहार, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कोलकाता मेट्रो, मुर्शिदाबाद, हावड़ा, मालदा और बीरभूम जैसे 8 जिलों में कुल 34 बड़ी घटनाएं दर्ज की गईं।
2. धार्मिक स्थलों और जीवन पर हमला
रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा का स्वरूप केवल मारपीट तक सीमित नहीं था:
- मस्जिदों पर हमले: कूचबिहार के गोसानीमारी में “जय श्री राम” जुलूस के दौरान एक मस्जिद पर हमला हुआ, जहाँ मस्जिद की रक्षा करते समय एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या कर दी गई। हावड़ा, बारासात और मुर्शिदाबाद में भी मस्जिदों को निशाना बनाया गया।
- आजीविका पर प्रहार: बारासात में मुस्लिम स्वामित्व वाले दो होटलों को गिरा दिया गया। कोलकाता और अन्य क्षेत्रों में मीट की दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और पशु बाजारों को जबरन बंद कराया गया, जिसे मुस्लिमों की आर्थिक कमर तोड़ने की कोशिश बताया गया है।
- पहचान मिटाने की कोशिश: मालदा और उत्तर 24 परगना में “सनाउल्लाह मंच” और “सिराजुद्दौला उद्यान” जैसे मुस्लिम नामों वाले सार्वजनिक स्थानों के नाम बदलने के प्रयास किए गए।
3. महिलाओं और नेताओं को भी नहीं बख्शा
APCR ने हावड़ा के डोमजूर में मुस्लिम महिलाओं को हिजाब पहनने से रोकने और धमकी भरे जुलूस निकालने की घटनाओं को भी रिपोर्ट में शामिल किया है। इसके अलावा, तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं के घरों और पार्टी दफ्तरों पर बुलडोज़र चलाने या कब्जा करने के मामले भी सामने आए हैं।
📝 विशेष कॉलम: मोरबतियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

प्रधान सम्पादक
PNN24 न्यूज़
काका का नज़रिया: “बबुआ, चुनाव जीतना एक बात है, पर लोकतंत्र में ‘विजेता’ का धर्म सबकी रक्षा करना होता है; अगर रिपोर्ट की बातें सच हैं, तो ई बंगाल की मिट्टी और तहज़ीब पर बहुत बड़ा दाग है!”
आज APCR की इस रिपोर्ट ने सबको खामोश कर दिया।
काका बोले: “बबुआ, राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है, पर जब किसी की इबादतगाह (मस्जिद), किसी की रोटी (मीट व्यापार) और किसी की पहचान (नाम और हिजाब) को निशाना बनाया जाए, तो समझो कि हार इंसानियत की हुई है। एपीआरसी ने जो आँकड़े दिए हैं, वो डराने वाले हैं। अगर गोसानीमारी में मस्जिद बचाते हुए किसी की जान गई है, तो ई केवल एक मौत नहीं, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो एक अल्पसंख्यक अपनी सरकार पर करता है।”
मैंने पूछा— “काका, क्या ऐसी घटनाओं से समाज में दरार नहीं बढ़ेगी?”
काका का जवाब: “बबुआ, दरार तो तब पड़ती है जब इंसाफ नहीं होता। निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, क्योंकि अगर गुनहगार को सज़ा नहीं मिली, तो नफ़रत की ये आग किसी को नहीं छोड़ेगी। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, सत्ता आती-जाती है, पर जो ज़ख्म दिलों पर दिए जाते हैं, उन्हें भरने में सदियाँ बीत जाती हैं’।”
📊 APCR रिपोर्ट: मुख्य बिंदु (Fact Box)
| श्रेणी | रिपोर्ट के मुख्य दावे |
| प्रभावित जिले | 8 (कूचबिहार, हावड़ा, मालदा, बीरभूम आदि) |
| कुल घटनाएं | 34 गंभीर मामले (4-7 मई के बीच) |
| निशाना | मस्जिदें, होटल, मीट दुकानें, पशु बाज़ार |
| सांस्कृतिक हमला | हिजाब पर रोक, ऐतिहासिक नामों को बदलने की कोशिश |
| निष्कर्ष | यह आर्थिक और सामाजिक पहचान मिटाने का प्रयास है |












