‘तालीम की राह में “मानव तस्करी” का रोड़ा? कटनी और कटक में रोके गए मदरसे में पढने जा रहे बिहार के बच्चों की दर्दनाक दास्तां; गरीबी और आवासीय सुविधा की कमी बनी पलायन की वजह!’
कटनी और कटक में बिहार के 200 से अधिक बच्चों को ट्रेन से उतारे जाने का मामला। पुलिस का मानव तस्करी का शक, परिजनों का शिक्षा का दावा। आखिर क्यों सीमांचल के बच्चे दूसरे राज्यों के मदरसों का रुख करते हैं? PNN24 की ग्राउंड रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
PNN24 News: पिछले महीने की 11 तारीख को मध्य प्रदेश के कटनी स्टेशन पर पटना-पुणे एक्सप्रेस से 163 बच्चों और 8 शिक्षकों को उतारा गया। पुलिस ने इसे मानव तस्करी की आशंका बताया, जबकि परिजनों का कहना है कि बच्चे हाफिज बनने और तालीम हासिल करने महाराष्ट्र जा रहे थे।
1. कार्रवाई का आधार और विवाद
- शिकायत: बाल कल्याण समिति के सदस्य दुर्गेश मारिया की लिखित शिकायत पर जीआरपी और आरपीएफ ने कार्रवाई की। आरोप था कि बच्चों को लातूर (महाराष्ट्र) मजदूरी के लिए ले जाया जा रहा है।
- दस्तावेज: बच्चों के साथ मौजूद शिक्षकों और परिजनों का दावा है कि उनके पास आधार कार्ड, मुखिया का पत्र और मदरसे का अप्रूवल लेटर मौजूद था। शिक्षक सद्दाम जरजीस के पास बगडहरा पंचायत की मुखिया का पत्र भी था।
- पुलिस का पक्ष: कटनी जीआरपी के ऑफिसर एलपी कश्यप के अनुसार, कार्रवाई पुख्ता जानकारी पर की गई थी, हालांकि परिजनों से पुष्टि के बाद बच्चों को वापस घर भेज दिया गया।
2. सीमांचल का संकट: आखिर बाहर क्यों जाते हैं बच्चे?
बिहार के सीमांचल इलाके (पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया) से हर साल हजारों बच्चे दूसरे राज्यों के मदरसों में जाते हैं। इसकी मुख्य वजहें इस प्रकार हैं:
- अत्यधिक गरीबी: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, प्रति व्यक्ति आय में अररिया 38 जिलों में 37वें स्थान पर है। अभिभावकों के पास प्राइवेट स्कूलों की फीस देने के पैसे नहीं हैं।
- आवासीय सुविधाओं का अभाव: बिहार के सरकारी और बोर्ड से मान्यता प्राप्त अधिकांश मदरसे ‘डे-स्कूल’ हैं। गरीब माता-पिता उन्हीं मदरसों को प्राथमिकता देते हैं जहां रहना और खाना मुफ्त हो।
- अनुशासन और दीनी तालीम: स्थानीय मदरसों में जगह की कमी और बच्चों को अनुशासित करने के लिए भी उन्हें दूर भेजा जाता है।
3. कटक (ओडिशा) में अब भी फंसे हैं बच्चे
कटनी के बच्चे तो 13 दिन बाद घर लौट आए, लेकिन ओडिशा के कटक में 59 बच्चे 14 अप्रैल से फंसे हुए हैं। बाल कल्याण समिति अररिया के दीपक कुमार वर्मा ने पुष्टि की है कि इन बच्चों की वापसी की प्रक्रिया चल रही है।
📝 विशेष कॉलम: तारिक आज़मी की मोरबतियाँ (लेखक: Tariq Azmi)

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काका का नज़रिया: “बबुआ, जब हाथ में किताब और सिर पर टोपी देखकर कानून को सिर्फ ‘जुर्म’ नज़र आने लगे, तो समझो कि चश्मे का नंबर बदलने की ज़रूरत है; गरीबी अगर गुनाह है, तो उसका इलाज सलाखें नहीं, स्कूल की छत होनी चाहिए!”
आज कटनी और कटक की इन घटनाओं पर काका का पारा गर्म था।
काका बोले: “बबुआ, जो बच्चा 699 रुपये का टिकट कटाकर, हाथ में आधार कार्ड और पंचायत का पत्र लेकर जा रहा है, उसे ‘तस्कर’ कहना कितना जायज है? अररिया की किसमती माँ 6 हजार का कर्ज लेकर अपने बच्चों को छुड़ाने कटनी पहुँच गई। अगर सरकार सीमांचल में ही अच्छे आवासीय स्कूल और मदरसे खोल दे, तो कोई माँ अपने जिगर के टुकड़े को 900 किलोमीटर दूर क्यों भेजेगी? दाढ़ी-टोपी देखकर शक करना अब एक नया फैशन बन गया है, जो संविधान के दस्तूर के खिलाफ है।”
मैंने पूछा— “काका, क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए पुलिस की सख्ती ज़रूरी नहीं है?”
काका का जवाब: “सुरक्षा ज़रूरी है बबुआ, पर प्रताड़ना नहीं। 13 दिन तक बच्चों को बाल सुधार गृह में रखना और सही खाना न देना सुरक्षा नहीं है। आधार कार्ड से जब सारी डिटेल मिल रही थी, तो इतना लंबा इंतजार क्यों? हम यही कहते हैं— ‘साहब, गरीब की गरीबी का मज़ाक न बनाओ, उसे तालीम की राह दो, शक की निगाह नहीं’।”
📊 सीमांचल की सांख्यिकी (Statistical Overview)
| जिला | मुस्लिम आबादी (%) | प्रति व्यक्ति आय रैंक (बिहार में) | शिक्षा में स्थिति |
| किशनगंज | 67% | 28वां | पिछड़ा |
| कटिहार | 42% | 24वां | सबसे फिसड्डी 5 जिलों में |
| अररिया | 41% | 37वां | सबसे फिसड्डी 5 जिलों में |
| पूर्णिया | 37% | 21वां | पिछड़ा |











