‘वाराणसी पुलिस कमिश्नर साहब! क्या जंसा में विधवा को नहीं मिलेगा इंसाफ? सिपाही पर विपक्षियों से मिलकर रास्ता कब्जा करवाने का गंभीर आरोप!’
वाराणसी: जंसा पुलिस के सिपाही पर विधवा की ज़मीन कब्जा करवाने का आरोप। पुलिस कमिश्नर के निर्देशों को ताक पर रख, क्या रसूखदारों के आगे झुक गया इंसाफ का तराजू? PNN24 की विशेष पड़ताल।

मो0 सलीम
वाराणसी (PNN24 News): वाराणसी पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल एक ओर जहाँ मातहतों को निष्पक्षता और महिला सुरक्षा का पाठ पढ़ा रहे हैं, वहीं जंसा थाना क्षेत्र के बडौरा ग्राम से खाकी को शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आई है。 यहाँ एक विधवा महिला, मुन्नी बेगम, ने स्थानीय सिपाही अरविन्द पर गंभीर आरोप लगाए हैं कि वह विपक्षियों से साठगांठ कर उसके हक का रास्ता कब्जा करवा रहे हैं。
1. क्या है पूरा मामला?
ग्राम बडौरा निवासी मुन्नी बेगम के स्वर्गवासी पति मुनीब का एक मकान है。 इस मकान के आगे उनके रिश्तेदार काकू और राजू का घर है, जिसके पास से मुन्नी बेगम का 5 फिट का निजी रास्ता जाता है。
- आरोप: पीड़िता का आरोप है कि पड़ोसी काकू और राजू उसके एकमात्र रास्ते को घेरकर पक्का निर्माण करवा रहे हैं。
- पुलिस की भूमिका: पीड़िता ने जब थाना प्रभारी से गुहार लगाई, तो उन्होंने दरोगा जय सिंह को निर्माण रुकवाने का निर्देश दिया。 दरोगा ने शुरुआत में निर्माण रुकवा भी दिया था。
2. सिपाही अरविन्द पर ‘सेटिंग’ के आरोप
पीड़िता का आरोप है कि निर्माण रुकने के बाद स्थानीय सिपाही अरविन्द ने मोर्चा संभाला。 आरोप के मुताबिक:
- सिपाही ने शिकायतकर्ता मुन्नी बेगम को ही खरी-खोटी सुनाई और आरोपी पक्ष को निर्माण जारी रखने की हरी झंडी दे दी。
- सिपाही की शह पर ही बीती रात रास्ते के बीचों-बीच पक्का पिलर गाड़ दिया गया。
3. अमीरी-गरीबी के बीच दबा इंसाफ?
स्थानीय सूत्रों और चर्चाओं की मानें तो सिपाही अरविन्द के संबंध दूसरे पक्ष (काकू और राजू) से काफी घनिष्ठ हैं。 मुन्नी बेगम गरीब और विधवा है, जबकि दूसरा पक्ष आर्थिक रूप से संपन्न है。 आरोप है कि पुलिस और लेखपाल का पलड़ा उसी तरफ झुका हुआ है, जहाँ ‘सुविधा’ उपलब्ध है。
📝 विशेष कॉलम: मोरबतियाँ (लेखक: तारिक आज़मी)

प्रधान सम्पादक
PNN24 न्यूज़
काका का नज़रिया: “बबुआ, जब रक्षक ही भक्षक के साथ ‘अड़ी’ जमा ले, तो गरीब विधवा कहाँ जाए? कमिश्नर साहब के निष्पक्षता के डोज़ का असर जंसा के सिपाहियों पर क्यों नहीं हो रहा?”
आज इस मामले ने काका को बेहद दुखी कर दिया।
काका बोले: “बबुआ, बनारस की पुलिस को तो ‘दोस्त’ होना चाहिए था, पर यहाँ तो सिपाही साहब खुद ही ‘जज’ बनकर पिलर गड़वा रहे हैं। मुन्नी बेगम विधवा है, बेसहारा है, तो क्या उसकी ज़मीन पर कोई भी पक्का पिलर गाड़ देगा? अगर दरोगा ने काम रुकवाया था, तो सिपाही की इतनी हिम्मत कि वो उसे फिर शुरू करवा दे? ई तो सीधे-सीधे अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार का मामला लग रहा है।”
मैंने पूछा— “काका, क्या बड़े अधिकारियों तक बात पहुँचेगी?”
काका का जवाब: “बबुआ, बात तो पहुँच गई है, पर कमिश्नर साहब को ई देखना होगा कि उनके निर्देशों को ‘ताक’ पर रखने वाले ऐसे सिपाहियों पर कार्रवाई कब होगी। जब तक खाकी का डर रसूखदारों को नहीं होगा, तब तक मुन्नी बेगम जैसी माताओं-बहनों का रास्ता ऐसे ही पिलर लगाकर रोका जाता रहेगा। काशी की अड़ियों पर हम यही कहते हैं— ‘साहब, इंसाफ का तराजू अगर पैसे से झुकेगा, तो कानून की लाठी बेअसर हो जाएगी’।”












