‘कृषि मंत्रालय में “हितों का टकराव”? केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी को खीरे की खेती के लिए मिली 99 लाख की सरकारी सब्सिडी; कांग्रेस का तीखा हमला, कहा- यह “डायरेक्ट फैमिली ट्रांसफर” है’
राष्ट्रीय राजनीति में उबाल: अपने ही मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) से खीरे की खेती के लिए 99.6 लाख की सरकारी सब्सिडी लेने पर घिरे केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का तीखा तंज- भाजपा के लिए 'सब्सिडी की शुरुआत घर से होती है', बताया खुली लूट। मंत्री ने कहा- मैं किसान हूं, 2018 में किया था आवेदन। पढ़ें PNN24 की विशेष राजनीतिक रिपोर्ट।

आफताब फारुकी
नई दिल्ली (PNN24 News): केंद्र सरकार के ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस’ के दावों के बीच एक नया और गंभीर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी द्वारा अपने ही मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले एक स्वायत्त संस्थान से खीरे (ककड़ी) की व्यावसायिक खेती परियोजना के लिए लगभग 99.6 लाख रुपये की मोटी सरकारी सब्सिडी लेने का मामला सामने आया है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार की एक खोजी पड़ताल (Investigation Report) में यह खुलासा होने के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और वामपंथी दलों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, वहीं मंत्री ने खुद को बचपन से किसान बताते हुए इस सब्सिडी का पुरजोर बचाव किया है।
🥒 क्या है पूरा मामला और कहाँ फंसा है “हितों का टकराव”?
अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी को यह वित्तीय लाभ एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत मिला है।
- परियोजना का विवरण: राजस्थान में 16,592 वर्गमीटर क्षेत्र में आधुनिक पॉलीहाउस तकनीक से खीरे की व्यावसायिक खेती करने के लिए मंत्री का कुल प्रोजेक्ट 1.99 करोड़ रुपये का था।
- सब्सिडी की मंजूरी: इस योजना का संचालन राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) के माध्यम से होता है, जो कृषि मंत्रालय के अधीन काम करता है। बोर्ड ने वर्ष 2025 के दौरान स्वीकृत कुल 467 परियोजनाओं में भागीरथ चौधरी के इस प्रोजेक्ट को शामिल किया और परियोजना लागत का अधिकतम 50 फीसदी यानी करीब 99.6 लाख रुपये की सब्सिडी मंजूर की।
-
विवाद की मुख्य वजह: हितों के टकराव (Conflict of Interest) का सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि भागीरथ चौधरी वर्तमान में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री होने के नाते इसी राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) के पदेन उपाध्यक्ष (Ex-officio Vice President) की भूमिका में हैं। यानी वे खुद ही इस योजना की निगरानी करने वाले संस्थान के शीर्ष पद पर हैं और खुद ही इसके सबसे बड़े लाभार्थी भी हैं।
🧑🌾 “मैं किसान हूं, कुछ नहीं छुपाया”— केंद्रीय मंत्री की सफाई
इस चौतरफा विवाद और मीडिया रिपोर्ट पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) से बातचीत में स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया है और न ही कोई जानकारी छिपाई है। मंत्री भागीरथ चौधरी ने अपने बचाव में कहा:
“मैं एक मूल किसान हूं और बचपन से ही खेती-बाड़ी से जुड़ा रहा हूं। मैंने कुछ भी गुप्त नहीं रखा है। देश भर में हजारों किसान पॉलीहाउस लगाते हैं और सरकारी सब्सिडी का लाभ उठाते हैं, एक किसान के नाते मैंने भी वही किया है। मैंने इस सब्सिडी के लिए मंत्री बनने से बहुत पहले, साल 2018 में ही आवेदन कर दिया था। मैंने अपनी परियोजना वाली जगह पर बकायदा एक बड़ा बोर्ड लगाया है, जिसमें बैंक से लिए गए लोन और सरकार से मिली सब्सिडी की पूरी पारदर्शी जानकारी लिखी है। वहां स्थानीय अधिकारी आते रहते हैं और मैं अन्य किसानों को नई तकनीक व प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग भी देता हूं।”
यह भी उल्लेखनीय है कि अखबार की जांच रिपोर्ट में भी मंत्री द्वारा किसी तकनीकी पात्रता या कागजी शर्तों के उल्लंघन का आरोप नहीं लगाया गया है, बल्कि नैतिक आधार पर वर्तमान पद और लाभ को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
💥 विपक्ष का तीखा हमला: “खुली लूट और डायरेक्ट फैमिली ट्रांसफर”
इस खुलासे को लपकते हुए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार पर भ्रष्टाचार और नैतिक पतन का आरोप लगाते हुए तीखे तंज कसे हैं:
-
पवन खेड़ा (कांग्रेस नेता): “भाजपा के लिए ‘सब्सिडी की शुरुआत घर से होती है।’ इसे केवल ‘हितों का टकराव’ कहना इस अपराध को छोटा करने जैसा होगा, यह तो सीधे तौर पर ‘खुली लूट’ है। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस के ‘चंदा-चोर’ आरएसएस-भाजपा के दावों को एक और करारा झटका लगा है। मंत्री जी खुद ही आवेदक हैं, खुद ही मंजूरी देने वाली व्यवस्था के मालिक हैं और खुद ही लाभार्थी भी हैं – तीनों भूमिकाएं एक ही व्यक्ति में समाहित हैं। जहां देश के गरीबों से सिर्फ 5 किलो मुफ्त राशन पर जिंदा रहने की उम्मीद की जाती है, वहीं मंत्री और उनके करीबी सरकारी खजाने को अपनी निजी जागीर समझकर सार्वजनिक धन उड़ा रहे हैं।”
-
जॉन ब्रिटास (माकपा सांसद – CPM): “नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (DBT) के लोक-कल्याणकारी मॉडल को बदलकर मानो अपनी पार्टी के लोगों के लिए ‘डायरेक्ट फैमिली ट्रांसफर’ में तब्दील कर दिया है।”











