शुभम केशरी और रवि पाण्डेय हत्याकाण्ड – जरा सोचे आखिर इस नफरत और बदले की भावना से किसका भला हुआ

तारिक़ आज़मी

वाराणसी में कुख्यात अपराधी शुभम केसरी और रवि पाण्डेय हत्या कांड का कोतवाली पुलिस ने सफल खुलासा कर डाला। हकीकत की सरज़मीन पर एसआई सच्चिदानद राय ने एक बढ़िया प्रयास किया। एसआई सचिदानंद राय और सर्विसलांस सेल के एसआई अरुण सिंह की मेहनत का नतीजा सामने आया और लगभग एक दर्जन के करीब लोगो से पूछताछ के बाद निष्कर्ष निकला और पुरे हत्याकांड का सफल खुलासा हुआ। इस घटना से सम्बंधित हमारे खबर “कही अन्दर के “घात” अथवा बाहरी “प्रतिघात” का शिकार तो नही हुआ खुद शिकारी” में ज़ाहिर हुई शंका सही साबित हुई और शुभम केसरी हत्याकांड का खुलासा हुआ।

हत्याकांड में रवि पाण्डेय गलत संगत के नतीजो का शिकार हुआ था। रवि पाण्डेय को “पॉवर” शब्द से बड़ा लगाव हो गया था और दोस्ती भी शुभम केसरी जैसे लोगो से हो गई। अपराध के दुनिया का ककहरा सीखने की तैयारी में रवि पाण्डेय दुसरे के बदले का शिकार एक बेकसूर की तरह हो गया और गलत संग साथ के नतीजो में मारा गया। शुभम केसरी के लिए तो “खून का बदला खून” जैसे अर्थहीन अलफ़ाज़ काल बन गए। आखिर शिकारी खुद शिकार हो जाता है जिसमे “घात” और प्रतिघात दोनों होता है।

अपराध की “आया राम, गया राम” दुनिया में शुभम केसरी का नाम मोहन निगम हत्याकांड से चर्चा में आया था। इसके बाद उसके ऊपर अपराध का भुत सवार हो गया था। शराब का नशा और लंगोटे का कच्चापन उसके शिकार का मुख्य कारण बन गया। नशे की चाहत और लड़की का नाच देखने के लिए वह शिकारी खुद के शिकार को करवाने के लिए शिकारियों के खेमे में चला गया जहा उसका गुमनाम अंधेरो में शिकार हो जाता है। मौत भी ऐसी दर्दनाक की लगभग 20 दिनों तक लाश को मुखाग्नि नही नसीब हुई और लाश सड़क किनारे सडती रही।

नफरत और बदले की भावना ने किसका भला किया ?

इस पुरे हत्याकाण्ड को बदले की भावना और नफरत के नज़र से देखा जा सकता है। मोहन निगम हत्याकाण्ड के बदले की भावना में मृतक मोहन निगम के साले सुनील निगम ने इस हत्या की सुपारी देकर अपने जीजा की हत्या का बदला लिया। अपनी विधवा बहन को देख कर खून का घूंट पीते रहे सुनील निगम ने अपने साथियों से मिलकर 5 लाख में शुभम केसरी को निपटाने की सुपारी दे डाला। सुपारी लेने वाले लोग भी शुभम केशरी को अच्छे तरीके से जानते थे और उन्होंने दोस्ती यारी में शुभम केसरी को लड़की का नाच दिखाने और शराब की दावत देकर बुलाया।

शुभम केसरी भी अपने साथ अपने नये दोस्त बने रवि पाण्डेय को लेकर चला जाता है। इसको शायद मौत की दावत कहा जा सकता है क्योकि हत्या तो केवल शुभम केसरी की होनी थी। मगर कहते है घलुआ में रवि पाण्डेय की जान चली गई। अमूमन नज़रियो से देखे तो नफरतो के समंदर ने दो जिन्दगिया खत्म हो गई। मगर इसको दुसरे तरफ देखे तो सिर्फ दो ही नही इसके आगे भी कई लोगो पर ये नफरत असर कर गई। चंद सिक्को की लालच में दबंगई की चाहत को ध्यान में रखने वालो ने हत्या कर डाली। अब नीरज, परवेज़, दिलशेर और गुड्डू भारद्वाज पुलिस हिरासत में है। वही करीम अहमद फरार है। इस सबको तो पैसो की लालच थी। खुद को “आया राम, गया राम” की चकाचौंध भरी दुनिया में इंट्री चाहिये थी। शायद इंट्री मिल भी गई अब उनको। मगर इसका अंजाम क्या हुआ ये सब देख रहे है।

दूसरी तरफ नफरत और बदले की भावना को दिल में बसाये सुनील निगम पर नज़र दौडाए। सुनील निगम अपने जीजा की हत्या के बाद से एक बड़ी शख्सियत के तौर पर उभर कर सामने आया हुआ नाम था। अपराध के खिलाफ अपनी आवाज़ बुनद करने वाला युवक कब खुद अपराध को गले लगा बैठा उसके परिजनों को भी नही पता था। आँख के बदले आँख और खून का बदला खून जैसे फ़िल्मी और जंगल के नियमो का पालन कब सुनील निगम करने लगा इसका किसी को अंदाजा नही लग पाया। सभी जानते है कि आँख के बदले आँख की भावना अगर दिल में हो तो संसार अन्धो से भर जायेगा। मगर सुनील निगम के दिल-ओ-दिमाग में बदला भर गया। कानून को अपना काम करने के बजाये खुद कानून को अपने हाथो में ले लिया और आखिर उसका सफ़र भी जेल के सलाखों के पीछे लेकर उसको पहुच गया।

अपने अपनों की सोचे

इस नफरत से किसी का भला आज तक नही हुआ है। अपराध जगत में चंद दिनों की चांदनी रहती है। मगर उसके बाद की काली राते अपराध जगत के युवक का परिवार देखता है। बड़ा नाम हुआ करता था अपराध का आज धूमिल हो चूका है। इतिहास उठा कर देख ले कि अपराध का खात्मा ज़रूर हुआ है। फिर उसके बाद उस अपराधी के परिवार की क्या स्थिति हो जाती है उसको भी देखे। परिवार दरबदर हो जाता है। बच्चो का भविष्य ख़राब हो जाता है। हो सकता है परिवार तब तक आँखे बंद किये रहे जब तक उसको पैसो की चमक दिखाई देती है।

ददुआ से लेकर वीरप्पन तक का इतिहास अपराध के अंत को दिखाने के लिए काफी है। किसी शहर गली मोहल्ले नहीं बल्कि विश्व में खौफ का दूसरा नाम ओसामा बिन लादेन का अंत देखे। सभी दौलत धरी रह गई और हाथ पसारे जाना पड़ा। लादेन की लाश तक परिवार को देखने के लिए नहीं मिली। अपने अपनों की सोचे। उनको समझे और खुद उनको समझाए। फिल्मो की फाइट सीन देख कर लड़का अगर खुद को सुपर स्टार अथवा माया-बुआ समझने की भूल कर रहा है तो उसको समझाये। उसको इस जगत के अँधेरे रास्तो को बताये। संयमी बने और बनाये। कानून पर विश्वास रखे। शुभम की हत्या करने वालो और करवाने वाले ने भी नही सोचा होगा और आखिर कानून के लम्बे हाथ उसके तक पहुच ही गए। याद रखे नफरत और बदले से किसी का भला नही हुआ है।

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