वाराणसी – चेतगंज बियर शॉप पर आबकारी विभाग से करके मेल, ओवर रेटिंग का हो रहा खुला खेल

तारिक आज़मी

वारणसी। वाराणसी के चेतगंज स्थित बियर शाप अक्सर चर्चाओं में रहती है। अक्सर ही स्थानीय पुलिस को यहाँ शांति व्यवस्था हेतु मेहनत करना होता है। इसका कारण जानने का जब हमने प्रयास किया तो जानकारी मिली कि अक्सर का विवाद केवल और केवल ओवर रेटिंग का होता है। निश्चित दाम से दस रुपया अधिक अमूमन दिनों में लिया जाता है। वही अगर किसी त्यौहार का मौसम है तो ये दाम बीस से तीस रुपया अधिक हो जाता है।

बताते चले कि चेतगंज चौराहे की बियर शाप का लाइसेंस वैसे तो अरुण कुमार सिंह के नाम से है। मगर इस दूकान का पूरा मैनेजमेंट किसी महानुभाव मनीष जी के पास है। हमको इस ओवर रेटिंग के सम्बन्ध में जानकारी मिली तो इस दूकान पर खुद ही चहलकदमी करते हुवे पहुच गया। दूकान पर ही खड़े होकर बियर पीते कई युवक नज़र आये। काफी केन मौके पर खाली पड़ा इस बात की दलील दे रहा था कि यहाँ बियर पीने की भी व्यवस्था बाबु मनीष जी ने स्पेशल नियमो को ताख पर रख कर कर रखा है। आप फोटो में देख सकते है कि लगभग 50 बियर का खाली केन एक कार्टून में इस बात की दलील दे रहा है कि आज ही वह गटक लिया गया है।

बहरहाल, कभी शराब का शौक नही रहा तो नाम वगैरह टीवी पर से ही मालूम पड़ता है। मामला बियर से जुडा हुआ था तो हमने दामो का दरियाफ्त करने के लिए कुछ देर खड़े होकर वह बियर ले रहे लोगो का केन देखा। एक नाम मुझको समझ आया टर्बो, इसका दाम लिखा था 130 रुपया। हमने दुकान पर बैठे सेल्समैंन से पूछा तो उसने बताया कि 140 रुपया। अब हम भी ठहरे हुज्जत-ए-बंगाल किस्म के इंसान तो हमने भी पूछा कि 140 किस बात का दाम तो लिखा है 130। सेल्समैन ने बताया कि दाम के अलावा खर्चा अलग से लगता है। अब हमारी जुज्जत बढती गई और हमने अगला सवाल पूछ लिया कैसा खर्च। सेल्समैन को हमारे ऊपर कुछ शक हो गया। उसने जेब से मोबाइल निकाला और एक किसी को फोन मिलाया। कुछ देर खुसुर फुसुर बात करने के बाद उसने मुझे फ़ोन देते हुवे कहा कि साहब से बात कर ले।

हम भी अचंभित थे कि कौन से साहब से बात करवा रहा है भाई। फोन लेकर परिचय उन्होंने पूछा तो थोडा हमारा भी सलीका अलग ही है। हमने कहा हमारा परिचय केवल सवालकर्ता के रूप में जाने और खुद का परिचय बताये। उधर से आने वाली आवाज़ ने अपना नाम मनीष बताया और कहा भाई हमारे कई पत्रकार मित्र लखनऊ में है। आप रेट का रेट बियर ले ले। हमने कहा भाई पहली बात तो तुम्हारे पत्रकार मित्र जो भी लखनऊ में है वो अपना काम करते है मैं अपना काम करता हु। मैं अपने काम में किसी की दखलअंदाजी पसंद नही करता। रही बात बीयर लेने की तो वो छोडो आप सिर्फ एक बात का जवाब दो कि ये ओवर रेटिंग क्यों ? आपका बन्दा मुझको कहता है दस रुपया खर्च लगता है तो खर्च किस बात का लगता है ?

अब फोन पर जो सज्जन थे उनके स्वर थोडा अलग ही थे। अरे भाई आप समझे, विभाग को जाता है। आबकारी को जाता है। नार्मल खर्च आता है। त्योहारों पर ये खर्च बढ़ जाता है और दाम भी बढाने पड़ते है आप बताये हम क्या करे ? हमने कहा भाई हम तो कहेगे कि अगर सही दाम पर प्रोडक्ट नही बेच सकते है तो दूकान बंद कर दो न, किसी डाक्टर ने कहा है कालाबाजारी करने को। एक दिन में आपके यहां जो सेल हमको दिखाई दे रही है कम से कम 500 बोतल बियर की बिक्री रोज़ की है। इस अनुपात में जोड़े तो आप 5000 प्रतिदिन केवल ओवररेटिंग का कमाते है। यानी डेढ़ लाख रुपया महीने का। 18 लाख रुपया साल का। ये सिर्फ आपका ओवर रेटिंग का पैसा है। इसके अलावा आपका मुनाफा अलग है।

बहरहाल, शायद मुझको लगा मनीष बाबु को हमारे जवाब पसंद नही आये और उधर से हेल्लो हेल्लो आवाज़ नही आ रही है हेल्लो हेल्लो करके फोन ही काट डाला। मगर सवाल काफी अन्धुरे रह गए कि एक शराब की दूकान का खुद को मैनेजर बताने वाला इंसान कैसे खुल्लम खुल्ला आबकारी विभाग पर उंगली उठा रहा है। वही आबकारी विभाग के अधिकारियो और कर्मचारियों को मालूम ही नहीं है कि शहर में ओवररेटिंग चल रही है। इसको कहते है कमाल है आबकारी विभाग।

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