तारिक आज़मी की मोरबतियाँ: विकास या विनाश? कोडीन कफ सिरप का ‘सफेद जहर’ और खोखली होती हमारी युवा नस्ल

शुभम जायसवाल, विकास सिंह और आकाश पाठक जैसे लोग समाज के वे दुश्मन हैं जो पैसों की हवस में एक पूरी पीढ़ी को अंधेरे में धकेल रहे हैं। इसके अलावा भी समाज के उन सफेदपोशो का संरक्षण इस सिंडिकेट को मिला हुआ है, जो अभी भी पर्दे के पीछे है। खादी, खाकी और कलम की तिकड़ी ऐसे संरक्षणदाताओं की श्रेणी में है, जिसके तमाम फोटो और वीडियो वायरल होते रह रहे है। मगर ऐसे सफ़ेदपोश आज भी पुलिस की पहुच से दूर है।

तारिक आज़मी

मोरबतियाँ लिखे तो काफी दिन बीत चूका था। हमारे काका भी तनिक ठन्डे पड़े हुवे है, साथ ही हम भी थोडा खुद के लगे झटके से सदमे में रहा हु। खाकी पहनकर हीरोगिरी करने वाले ड्रोन कैमरा से खुद की इन्स्टाग्राम और फेसबुक रील बनाने वाले खाकी को कर्त्तव्य नहीं फैशन बनाने वाले दरोगा जब ‘मोरबतियाँ’ को कफ सिरप की चुस्कियां कहकर झूठ के एक गंदे लिबास को सच का जामा पहना कर परोसने की कोशिश करने वाले ‘ताने’ दे तो हकीकत ये है कि ‘हौसला टूटता है गुरु।’

मगर काका ने जब से समझाया कि ‘अरे बबुआ साजिश हमेशा बड़ी होती है।’ तो हम भी समझ गए कि ‘गुरु बात तो सही है, खादी, खाकी और कलम गठजोड़ करके ऐसे शुभम को संरक्षण देकर अपना सरदर्द दूर करने की कोशिश करेगे तो साजिश ही करेगे। ऐसे में हौसला हारना बेमतलब की बात होगी। हौसला भी किससे हारे, जो वर्दी पर अपना खुद का असली नाम न लिख कर फ़िल्मी नाम लिख रहा हो। अब रही बात प्रशासनिक पादुका पूजन तो आज तक नहीं किया अब जब ज़िन्दगी की आखरी इनिंग चल रही हो तो फिर क्या बदलाव किया जाए? तो आइये इस ‘हॉट केक’ बन चुके कफ सिरप सिंडिकेट पर बात करते है।

वाराणसी पुलिस और एसआईटी (SIT) द्वारा 15 करोड़ रुपये के कोडीन कफ सिरप घोटाले का भंडाफोड़ करना महज एक आपराधिक कामयाबी नहीं है, बल्कि यह उस भयावह खतरे की तरफ इशारा है जो हमारी दहलीज पर दस्तक दे चुका है। जब एक जीवन रक्षक दवा (कफ सिरप) को नशे के सौदागर ‘मौत के सामान’ में तब्दील कर देते हैं, तो सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि समाज के अस्तित्व का बन जाता है।

दवा की आड़ में धीमा जहर कोडीन युक्त कफ सिरप दरअसल एक गंभीर नशे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। तस्करी के इस खेल में ‘फर्जी कंपनियां’ और ‘फर्जी फार्मेसी’ का सहारा लिया जाता है। 5 लाख से अधिक बोतलों की तस्करी यह बताने के लिए काफी है कि मांग कितनी भयावह है। ये बोतलें दवाखानों से नहीं, बल्कि गलियों के उन अंधेरे कोनों में पहुंच रही हैं जहाँ हमारा युवा अपना भविष्य धुएं में उड़ा रहा है।

युवा पीढ़ी पर प्रहार नशे के सौदागरों के निशाने पर सबसे अधिक स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्र हैं। कोडीन का नशा न केवल शारीरिक रूप से शरीर को खोखला करता है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक ढांचे को भी तबाह कर देता है। 15 करोड़ के इस कारोबार के पीछे न जाने कितने हज़ारों परिवारों की खुशियां और मेहनत की कमाई बर्बाद हुई होगी।

सफेदपोश अपराधियों का मकड़जाल गिरफ्तार किए गए आरोपियों के पास से ‘मेड रेमेडी लाइफकेयर’ जैसी फर्जी फर्में मिलना यह साबित करता है कि यह कारोबार पेशेवर तरीके से ‘व्हाइट कॉलर’ अपराधियों द्वारा संचालित है। शुभम जायसवाल, विकास सिंह और आकाश पाठक जैसे लोग समाज के वे दुश्मन हैं जो पैसों की हवस में एक पूरी पीढ़ी को अंधेरे में धकेल रहे हैं। इसके अलावा भी समाज के उन सफेदपोशो का संरक्षण इस सिंडिकेट को मिला हुआ है, जो अभी भी पर्दे के पीछे है। खादी, खाकी और कलम की तिकड़ी ऐसे संरक्षणदाताओं की श्रेणी में है, जिसके तमाम फोटो और वीडियो वायरल होते रह रहे है। मगर ऐसे सफ़ेदपोश आज भी पुलिस की पहुच से दूर है।

पुलिस की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन क्या केवल गिरफ्तारी काफी है? इस नशे के जाल को पूरी तरह खत्म करने के लिए तीन स्तरों पर काम करना होगा:

  1. कड़ी निगरानी: मेडिकल स्टोर्स और फार्मा कंपनियों की सप्लाई चेन का सख्त ऑडिट।
  2. जागरूकता: माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के बदलते व्यवहार पर नजर रखनी होगी।
  3. सामाजिक बहिष्कार: नशे के कारोबारियों और उनके संरक्षणदाताओं का सामाजिक स्तर पर बहिष्कार।

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