‘अली डे’ पर बनारस की गलियों में गूंजा ”मनकुन्तो मौला अली अली या अली’, अज़ीम-ओ-शान तरीके से निकला जुलूस दरगाह फातमान पर हुआ मुकम्मल

तारिक आज़मी

वाराणसी: धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में मौला-ए-कायनात हजरत अली (अ.स.) की विलादत (जयंती) का जश्न पूरी अकीदत और एहतराम के साथ मनाया गया। ‘हजरत अली समिति’ के तत्वावधान में आयोजित ‘अली डे’ जुलूस ने बनारस की गलियों को रूहानी रंग में सराबोर कर दिया। हाथों में लाल झंडा लिए और ‘मनकुन्तो मौला अली अली’ के नारे लगाते अकीदतमंदों का हुजूम देखते ही बन रहा था।

टाउन हॉल से फातमान तक का सफर: जुलूस का शुभारंभ टाउन हॉल से हुआ। यहाँ से अकीदतमंदों का कारवां मैदागिन, नीचीबाग, चौक, दालमंडी, नई सड़क, शेख सलीम फाटक, कालीमहल, पितरकुंडा और लालपुरा जैसे ऐतिहासिक रास्तों से होता हुआ दरगाह फातमान पहुँचा, जहाँ दुआ के साथ जुलूस मुकम्मल हुआ। रास्ते भर मौला अली की शान में कसीदे और सलातो-सलाम के नजराने पेश किए गए।

इंसानियत और बराबरी का संदेश: जुलूस की अगुवाई कर रहे मौलाना शाहिद अब्बास ने हजरत अली के जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए कहा:

“‘अली डे’ मनाने का मुख्य उद्देश्य दुनिया को यह संदेश देना है कि हजरत अली जैसी महान शख्सियत ने हक, इंसाफ और इंसानियत का रास्ता दिखाया। उन्होंने कभी शिया-सुन्नी या अपने-पराए का भेद नहीं किया, बल्कि हर इंसान को बराबरी की नजर से देखा।”

सुरक्षा के रहे पुख्ता इंतजाम: जुलूस की संवेदनशीलता को देखते हुए वाराणसी प्रशासन और पुलिस बल पूरे मार्ग पर मुस्तैद रहा। मैदागिन से लेकर पितरकुंडा तक चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात थे। शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में यह अज़ीम-ओ-शान जुलूस संपन्न हुआ।

मौला अली के बेशकीमती कौल (अनमोल वचन):

  • “इंसान का असली गौरव उसके ज्ञान और आचरण में है, उसकी दौलत में नहीं।”

  • “मजलूम की मदद करना और भूखे को खाना खिलाना ही सच्ची इबादत है।”

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