‘वाराणसी स्मार्ट सिटी का “स्मार्ट” भ्रष्टाचार: बेनिया और मैदागिन पार्किंग में ठेकेदारों की “लूट” से जनता बेहाल; ₹25 हज़ार की “पेटी ठेकेदारी” पर टिकी है अफसरों की ईमानदारी, क्या नगर आयुक्त करेंगे इन “स्मार्ट सिटी के सुपर स्मार्ट” साहबों से लेंगे हिसाब?’
वाराणसी: स्मार्ट सिटी या 'सफ़ेद हाथी'? बेनिया और मैदागिन पार्किंग बनी मुनाफाखोरी का अड्डा। ₹25,000 प्रतिदिन की 'पेटी' पर चल रहा है अवैध वसूली का खेल। सड़क तक गाड़ियों की कतार, ट्रैफिक पुलिस की मेहरबानी और अफसरों की बंद आँखें। क्या 'सुपर स्मार्ट' साहब को नहीं दिख रहा ठेकेदारों का यह 'लूट सको तो लूट लो' अभियान? PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने का सपना अब आम जनता के लिए किसी ‘नरकीय’ अनुभव से कम नहीं रह गया है। करोड़ों की लागत से बनी बेनिया और मैदागिन की पार्किंग आज स्मार्ट सिटी के अधिकारियों की नाक के नीचे भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी का सबसे बड़ा केंद्र बन चुकी हैं। आलम यह है कि खुद को ‘पाक-साफ़’ बताने वाले स्मार्ट सिटी के ज़िम्मेदार अधिकारी ठेकेदारों के आगे नतमस्तक नज़र आ रहे हैं।
1. ‘पेटी ठेकेदारी’ का खेल और ₹25,000 की दिहाड़ी
PNN24 के सूत्रों से मिली जानकारी चौंकाने वाली है। मुख्य टेंडर धारक ने मोटी रकम लेकर इन पार्किंग और पार्कों को ‘पेटी ठेकेदारों’ के हवाले कर दिया है। बताया जा रहा है कि पेटी ठेकेदार असली टेंडर धारक को ₹25,000 प्रतिदिन का भुगतान कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि जब टेंडर इससे कहीं कम रकम में पास हुआ है, तो यह अतिरिक्त मुनाफ़ा किसकी जेब से निकाला जा रहा है? ज़ाहिर है, आम जनता की जेब से ‘लूट सको तो लूट लो’ की तर्ज पर वसूली हो रही है।
2. बेनिया पार्किंग: सड़क पर जाम और अंदर ‘अराजकता’
पार्किंग के अंदर का वीडियो (जो हमारे पास उपलब्ध है) साफ़ दिखाता है कि जिस रास्ते को गाड़ियों के निकलने के लिए बनाया गया था, ठेकेदार ने उस पर भी बेतरतीब तरीके से गाड़ियाँ खड़ी करवा दी हैं।
- जाम का झाम: मैदागिन टाउनहाल और बेनिया की पार्किंग के कारण बाहर सड़क पर कोतवाली गेट तक गाड़ियों की लंबी लाइन लग जाती है, जो पूरे शहर के ट्रैफिक को ‘नरक’ बना देती है।
- पुलिस की भूमिका: बेनिया पर तैनात ट्रैफिक कांस्टेबल सरकारी ड्यूटी कम और पार्किंग ठेकेदार के ‘सुविधा प्रदाता’ के रूप में ज़्यादा काम करते नज़र आते हैं।
3. बेनिया पार्क: खुली हवा में ‘सांसों’ का सौदा
बेनिया पार्क, जिसे शहर का फेफड़ा कहा जाना चाहिए था, उसे ठेकेदार ने ‘बाज़ार‘ बना दिया है।
- झूलों का जाल: मुनाफाखोरी के चक्कर में पार्क में झूलों की संख्या इतनी बढ़ा दी गई है कि टहलने की जगह ही नहीं बची।
- अवैध खोमचे: फुटपाथ के खोमचे वालों से रोज़ाना वसूली कर उन्हें पार्क के अंदर लगाने का ‘लाइसेंस’ ठेकेदार खुद बांट रहे हैं। क्या स्मार्ट सिटी के ‘सुपर स्मार्ट’ साहब को यह अतिक्रमण दिखाई नहीं देता?
4. ‘ऊँची पकड़’ और अफसरों की मजबूरी?
चर्चा है कि टेंडर धारक की पकड़ ‘ऊपर’ तक इतनी मज़बूत है कि नीचे के अधिकारी चाहकर भी मुँह नहीं खोल पा रहे। ‘मौका मिला तो भ्रष्टाचारी और नहीं मिला तो क्रांतिकारी’ की कहावत यहाँ के अफसरों पर सटीक बैठती है। आखिर सरकारी खजाने की इस बंदरबांट पर नगर आयुक्त साहब चुप क्यों हैं?
काका का नज़रिया: “बबुआ, जब ‘ईमानदारी’ की पट्टी आँखों पर बँधी हो और जेब में ‘सुविधाओं’ का वज़न हो, तो पार्किंग का रास्ता भी ‘अंधेर नगरी’ की ओर ही जाता है!”
आज दोपहर जब मैं (तारिक आज़मी) बेनिया पार्क के पास से गुज़रा, तो वहाँ का नज़ारा देखकर काका की याद आ गई। हम भी ठहरे काका के भक्त तो उनको फोन करके उनका नजरिया मांग बैठे,
काका बोले: “बबुआ, ई स्मार्ट सिटी तो सिर्फ कागज़ों पर स्मार्ट है, ज़मीन पर तो ‘पेटी’ का खेल चल रहा है। ₹25 हज़ार रोज़ाना का पेटी ठेका… समझ रहे हो? इसका मतलब है कि ठेकेदार को कम से कम ₹50 हज़ार रोज़ वसूलने होंगे। अब वो ₹50 हज़ार कहाँ से आएंगे? वो आएंगे बेतरतीब गाड़ियों से, ऊँची दरों से और पार्क की ज़मीन बेचने से। स्मार्ट सिटी के साहब भले कहें कि वो बहुत ईमानदार हैं, पर उनकी नाक के नीचे जो लूट मची है, वो उनकी ‘स्मार्टनेस’ पर बड़ा दाग है।”
मैंने पूछा— “काका, क्या नगर आयुक्त इस पर एक्शन लेंगे?”
काका का जवाब: “नगर आयुक्त साहब को अगर फुर्सत मिले तो शाम को बेनिया की भीड़ में ज़रा टहल कर देखें। ठेकेदार लूट मचाए हैं, ट्रैफिक सिपाही रास्ता बनवा रहे हैं और जनता जाम में पिस रही है। ‘सुपर स्मार्ट’ साहब बहादुरों को शायद एसी कमरों से बाहर की धूप और धूल नहीं दिखती। काशी की जनता अब जाग रही है, ये पेटी ठेकेदारी का खेल अब ज़्यादा दिन नहीं चलेगा। वतन की मिट्टी और जनता की जेब से खिलवाड़ करने वालों का हिसाब तो होकर रहेगा!”
📊 PNN24 पड़ताल: स्मार्ट सिटी पार्किंग का ‘कच्चा चिट्ठा’
| विवरण | बेनिया/मैदागिन पार्किंग की हकीकत |
| संचालन मोड | पेटी ठेकेदारी (Sub-Contracting) |
| अनुमानित भुगतान | ₹25,000 प्रतिदिन (पेटी ठेकेदार द्वारा) |
| प्रमुख समस्या | सड़क पर जाम, निकासी मार्ग पर अवैध पार्किंग |
| पार्क की स्थिति | झूलों का अतिक्रमण और अवैध खोमचे की अनुमति |
| ट्रैफिक व्यवस्था | पुलिस द्वारा पार्किंग संचालकों को ‘विशेष सहयोग’ |
| अफसरों का रुख | पूरी तरह नज़रअंदाज़ (मौन समर्थन?) |












