‘दालमंडी चौड़ीकरण: आपदा में अवसर तलाश रहे सपा नेता; बीमार चाचा का हक बेचकर खुद हुए “काबिज़”, पुलिस ले गई थाने तो ढीली हुई अचकन!’
वाराणसी: दालमंडी चौड़ीकरण के बीच सपा नेता की 'अवसरवादिता'। बुजुर्ग और बीमार चाचा को बिना बताए बेच दिया पुश्तैनी हिस्सा। चचेरी बहनों के हंगामे के बाद चौक पुलिस ने नेताजी को हिरासत में लिया। थाने में हुई पंचायत के बाद मिला हिस्सा।

तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): दालमंडी चौड़ीकरण के बीच जहाँ सपा मुखिया अखिलेश यादव प्रभावितों के साथ संघर्ष का वादा कर रहे हैं, वहीं वाराणसी में उन्हीं की पार्टी के एक अल्पसंख्यक नेता पर अपने ही बुजुर्ग और बीमार चाचा के साथ धोखाधड़ी करने का गंभीर आरोप लगा है। मामला दालमंडी (भवन संख्या CK 43/146) और काशीपुर (भवन संख्या CK 62/59) से जुड़ा है।
1. आपदा में ‘अवसर’ की तलाश
मरहूम इसहाक साहब के दो बेटों, मो0 इकराम और इकबाल के बीच दो मकानों का बराबर हिस्सा था। इकराम साहब दालमंडी वाले मकान में काबिज़ थे, जबकि इकबाल साहब के बेटे (सपा नेता और उनके भाई) काशीपुर वाले मकान में रह रहे थे।
- चुपचाप बेच दिया हिस्सा: दालमंडी चौड़ीकरण की योजना आते ही सपा नेता ने अपने भाइयों के साथ मिलकर दालमंडी वाले भवन का अपना हिस्सा प्रशासन को बेच दिया।
- बीमार परिवार की अनदेखी: इकराम साहब का परिवार बेहद संकट में है—उनका बेटा और पोता मानसिक रोगी हैं और एक बेटी 10 साल से बिस्तर पर है। हिस्सेदारी बेचे जाने की खबर सुनकर बुजुर्ग इकराम साहब सदमे में आ गए।
2. चचेरी बहनों का हंगामा और पुलिस की कार्रवाई
जब नेताजी ने काशीपुर वाले मकान में चाचा को उनका हिस्सा देने से मना कर दिया और ‘अदालत जाने’ की सलाह दी, तो उनकी चचेरी बहनें और बुजुर्ग चाची नेताजी के आवास पर पहुँच गईं।
- थाने पहुँचे नेताजी: मौके पर जमकर हंगामा हुआ, जिसके बाद चौक पुलिस नेताजी और उनके भाई को हिरासत में लेकर थाने ले आई।
- अकेले पड़े सपाई: दिलचस्प बात यह रही कि पंचायत के दौरान सपा का कोई कार्यकर्ता नेताजी के साथ नहीं दिखा, जबकि एक कांग्रेसी नेता वस्तुस्थिति जानकर लौट गए।
3. थाने में पंचायत: एक कमरा मिला, पर शर्तें अभी बाकी
थाने में घंटों चली लंबी पंचायत और पुलिस की सख्ती के बाद नेताजी के तेवर ढीले पड़े।
- कब्जा सौंपा: नेताजी ने आखिरकार अपने चाचा को काशीपुर वाले भवन में एक कमरा कब्जे में दिया।
- अजीब शर्त: हालांकि, अभी भी विवाद पूरी तरह शांत नहीं हुआ है क्योंकि चाचा को कमरा तो मिला है, लेकिन लैट्रिन और बाथरूम के प्रयोग पर पाबंदी की शर्त रखी गई है।
📝 विशेष कॉलम: तारिक आज़मी की मोरबतियाँ (Tariq Azmi)
काका का नज़रिया: “बबुआ, जो नेताजी बाहर मुस्लिम वोटों का ‘ठेकेदार’ बनते हैं, घर के अंदर अपने ही माज़ूर चाचा की छत छीनने पर आमादा हैं; खाकी के सामने खादी की अचकन तभी ढीली होती है जब पाप का घड़ा भर जाता है!”
आज दालमंडी के इस पारिवारिक घमासान पर काका ने कड़वी बात कही।
काका बोले: “बबुआ, राजनीति में लम्बे-चौड़े भाषण देना और अपनों का हक मारना, ई दोनों अलग-अलग बातें हैं। दालमंडी चौड़ीकरण तो प्रशासन करा रहा है, पर नेताजी ने तो ‘आपदा को अवसर’ बना लिया। अपने बीमार चाचा और मानसिक रोगी भतीजे का आशियाना बेचकर खुद चैन से सोना चाहते थे? भला हो पुलिस का जो इन्हें थाने ले गई, वरना ‘अदालत जाओ’ कहकर ई तो पल्ला झाड़ चुके थे।”
मैंने पूछा— “काका, क्या अब मामला सुलझ गया?”
काका का जवाब: “बबुआ, अभी तो ‘पिक्चर’ बाकी है। कमरा दे दिया पर लैट्रिन-बाथरूम नहीं? ई तो वही बात हुई कि रोटी दी पर पानी नहीं। हम यही कहते हैं— ‘साहब, अपनों का दिल दुखाकर जो महल खड़ा होता है, उसकी बुनियाद हमेशा कमज़ोर होती है’।”











