वन अंगार हुआ… जब खिले पलाश फूल

फ़ारुख हुसैन,एम खान

सिंगाही खीरी। वन अंगार हुआ… जब खिले पलाश फूल के गीत की पंक्तियां यहां के पलाश वन क्षेत्र में चरितार्थ हो रही हैं। पलाश, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू, सुपर्णा, ब्रह्मवृक्ष पर्याय नामों से जाने जाते हैं। क्षेत्र के लिए सौगात बने क्षेत्र के पलाश वन इन दिनों में शबाब पर हैं। पेड़ों से झड़े फूलों से जहां धरती लाल-लाल नजर आती है, वहीं पेड़ों पर पुष्प गुच्छ अंगारें की तरह दहकते से दिखाई दे रहे हैं। प्राचीनकाल में होली के रंग भी इन्हीं फूलों से बनते रहे हैं। इसका फूल अत्यंत सुंदर तो होता है पर उसमें गंध नहीं होते पत्ते, फूल और फल तीनों भेदों के समान ही होते हैं । वृक्ष बहुत ऊँचा नहीं होता, मझोले आकार का होता है । क्षुप झाड़ियों के रूप में अर्थात् एक स्थान पर पास पास बहुत से उगते हैं। पत्ते इसके गोल और बीच में कुछ नुकीले होते हैं जिनका रंग पीठ की ओर सफेद और सामने की ओर हरा होता है । पत्ते सीकों में निकलते हैं और एक में तीन तीन होते हैं । इसकी छाल मोटी और रेशेदार होती है । लकड़ी बड़ी टेढ़ी मेढ़ी होती है।

बसंत से शुरू हो जाता है पलाश का फूलना बसंत ऋतु के साथ ही इनका फूलना शुरु हो जाता है। ऋतुराज बसंत का आगमन पलाश के बगैर पूर्ण नहीं होता। यानि इसके बिना बसंत का श्रृंगार नहीं होता। शाख पर झूले लाल किंशुक खुशी से फूले नहीं समा रहे हैं। संस्कृत में इसका नाम किंशुक है जिसका अर्थ शुक या तोता होता है। लाल फूलों वाले इस पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया योनोस्पर्माज् है। डाक टिकट पर भी है राज्य पुष्प पलाश विभिन्न रासायनिक गुण होने के कारण यह आयुर्वेद के लिए विशेष उपयोगी है।

इसके गोंद, पत्ता, जड़, पुष्प सभी औषधीय गुणों से ओतप्रोत हैं। इसका पुष्प उत्तर प्रदेश सरकार का च्राज्य-पुष्पज् भी कहलाता है। यह पुष्प डाक टिकट पर भी शोभायमान हो चुका है। ढाक के तीन पात कहावत भी सुनी होगी। शिव से अभिशाप से अंगारे से बने फूल यह वृक्ष हिंदुओं के पवित्र माने हुए वृक्षों में से हैं । इसका उल्लेख वेदों तक में मिलता है । इसके तीन पात शिव के तीन नेेत्रों के प्रतीक है। कामदेव ने शिव पर फूलों के वाणों से प्रहार किया उस समय कामदेव ढाक पर ही बैठा था। शिव का तीसरा नेत्र खुला तो कामदेव भी जलने लगा। तब ढाक ने शिव से कहा कि मेरा क्या अपराध है। शिव ने कहा कि तेरे फूल आग के ही रंग के होंगे और तेरे पत्ते मेरे तीन नेेत्रों की भांति त्रिपत्र के रुप में रहेंगे।

भोजन में इसके बने पत्तल और दोना के प्रयोग पलाश के पत्तों से दोना (कटोरी) और पत्तल (थाली) बनाए जाते हैं। इसकी जड़ों से रस्सी और नाव की दरारें भरने का काम किया जाता है। पलाश की पत्तल पर भोजन करने से चांदी के पात्र में भोजन करने जैसा लाभ मिलता है। यह शास्त्रोक्त है। समय के साथ अब पत्तल और दोना प्लास्टिक के आ गए हैं, जो नुकसानदायक हैं। जबकि ढाक लाभदायक रहा है।

रंग ही नहीं औषधि भी हैं टेसू के फूल

बुजुर्गों का कहना है कि टेसू के फूल त्वचा रोग में लाभकारी है। कहना है कि टेसू के फूल को घिस कर चिकन पाक्स के रोगियों को लगाया जा सकता है। हल्के गुनगुने पानी में डालकर सूजन वाली जगह धोने से सूजन समाप्त होती
है।

वन विभाग लाचार, घट रहे वन क्षेत्र
सिंगाही निघासन की सडकों के किनारें और दुधवा टाईगर रिजर्व में सैकड़ों बीघा में इस तरह का विशाल वन क्षेत्र है। वन विभाग की उदासीनता के कारण इन वनों का क्षेत्रफल घट रहा है।

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