तारिक आज़मी की मोरबतियाँ: कब्र पर फूल, मीडिया में भूचाल: जब ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की खेती के लिए मुर्दे भी कम पड़ जाएं…
कब्र पर फूल और मीडिया में भूचाल! अतीक-अशरफ की कब्र पर फूल चढ़ने को 'राष्ट्रीय संकट' बनाने वाली पत्रकारिता पर PNN24 का तीखा व्यंग्य। क्या रिपोर्टिंग का स्तर अब गेंदा और गुलाब की वैरायटी तक सिमट गया है?

इनपुट: तारिक खान
प्रयागराज: जर्नलिज्म के इतिहास में शायद यह पहली बार होगा जब पुलिस से पहले मीडिया ने फूलों का ‘डीएनए टेस्ट’ शुरू कर दिया है। प्रयागराज के एक कब्रिस्तान में पूर्व सांसद अतीक अहमद और अशरफ की कब्र पर कुछ फूल चढ़े, और देखते ही देखते टीवी चैनलों की स्क्रीन पर ‘महा-संकट’ जैसी पट्टियाँ चलने लगीं। ऐसा लगा मानो देश की बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे रातोंरात हल हो गए हैं और अब राष्ट्र का एकमात्र लक्ष्य यह जानना है कि— “वह फूल आखिर लाया कौन?”

- फूल ‘इम्पोर्टेड’ थे या देशी गेंदा?
- क्या फूल चढ़ाने वाले का कोई ‘वैचारिक’ रिश्ता था?
- और सबसे बड़ा सवाल— क्या इन फूलों का उगना किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है?
मीडिया अब कब्रिस्तान के आसपास के गमलों की गिनती में जुटा है। बहस इस पर नहीं है कि अपराध क्या है, बहस इस पर है कि जिस कैमरे ने फूल देखे, उसमें अतीक के बेटे क्यों नहीं दिखे? यानी अब ‘गैर-मौजूदगी’ भी खबर है!
जमीन के नीचे चला गया रिपोर्टिंग का स्तर यह खबर अतीक अहमद के बारे में कम और आज की पत्रकारिता की हालत पर ज्यादा है। जब एक कब्र पर फूल चढ़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया जाने लगे, तो समझ लीजिए कि रिपोर्टिंग का स्तर उसी कब्र के बराबर नीचे चला गया है।

प्रधान सम्पादक
यह व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस ‘सर्कस’ पर है जिसे हम पत्रकारिता समझ बैठे हैं। जब मीडिया तथ्यों को छोड़कर फालतू सनसनी को ‘ब्रेकिंग’ बनाकर परोसता है, तो वह समाज को आईना नहीं दिखाता, बल्कि खुद को ट्रोल होने का मौका देता है। जनता को रोटी-रोज़गार के सवाल चाहिए, लेकिन कैमरे फूलों की पंखुड़ियां गिन रहे हैं।











