‘इज़राइल के “रिज़र्व सैनिकों” की थकावट और बनारस के “बुनकरों” के खाली पेट पर तारिक आज़मी की मोरबतियाँ: काका का फलसफा— “बबुआ, जब दुनिया बारूद बोएगी, तो रेशम कहाँ से उगेगा?”‘;
व्यंग्य: तारिक आज़मी की 'मोरबत्तियाँ'— इज़राइल में 'बंदूक' थकी, बनारस में 'करघा' रुका! काका बोले— "बबुआ, जंग सरहद पर हो या बाज़ार में, पिसता हमेशा गरीब ही है।" इज़राइली सेना की थकावट और बनारसी बुनकरों की मंदी पर एक मर्मस्पर्शी विश्लेषण। PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

तारिक आज़मी
वाराणसी (PNN24 News): आज सुबह काका लल्लापुरा में अपने दोस्त ‘कल्लोईआ के अब्बा‘ के कारखाने मुझे लेकर पहुच गये। काका की बात काटना “महायुद्ध” को दावत देने से कम थोड़ी है। लल्लापुरा की एक तंग गली में रहने वाले “कल्लोईआ के अब्बा” के एक पुराने करघे (Handloom) के पास काका बैठे थे। करघा खामोश था, और बुनकर जो हमारे काका के परम मित्र है उनकी आँखें पथराई हुई थीं। तभी रेडियो पर खबर आई कि इज़राइल के विपक्षी नेता यायर लैपिड कह रहे हैं— “हमारे रिज़र्व सैनिक बुरी तरह थक चुके हैं, वे अब और नहीं लड़ सकते।”

मैंने पूछा— “काका, इज़राइल के फौजी और बनारस के बुनकर का क्या मेल?”
1. ‘रिज़र्व’ की मजबूरी
काका ने समझाया— “देख बबुआ, इज़राइल का वो ‘रिज़र्व सैनिक’ कौन है? वो कोई परमानेंट फौजी नहीं है। वो कल तक डॉक्टर था, इंजीनियर था, या किसी दुकान का मालिक था। उसे जबरन बंदूक थमाकर मोर्चे पर भेज दिया गया। अब महीनो से वो घर नहीं लौटा, धंधा चौपट हो गया, और शरीर जवाब दे गया। वो थक गया है क्योंकि वो ‘मौत’ का सौदागर नहीं, ‘ज़िंदगी’ जीने वाला इंसान था।”
2. बनारस का ‘खामोश’ करघा
काका ने आगे कहा— “अब इधर अपने बुनकर भाई को देख। इसकी ‘जंग’ बाज़ार से है। जब दुनिया में मिसाइलें चलेंगी, तो बनारसी साड़ी कौन खरीदेगा? खाड़ी देशों में युद्ध है, यूरोप डरा हुआ है, और अमेरिका की जेब फटी हुई है। जब ‘रेशम’ का ऑर्डर ही नहीं आएगा, तो ये करघा तो थकेगा ही। यहाँ ‘रिज़र्व’ में कुछ नहीं बचा— न जमा-पूंजी, न राशन। एक अरसे से सरकारी उपेक्षा के शिकार बनारसी बुनकर अब परदेश में मजदूरी करने को मजबूर है, जो थोड़े बहुत बचे है उनकी दाल रोटी के लाले पड़े है”
3. “थकान” का असली चेहरा
काका बोले— “बबुआ, लैपिड साहेब कह रहे हैं कि फौजी ‘घायल’ हालत में लड़ रहे हैं। यहाँ का बुनकर भी ‘घायल’ है— मंदी की मार से, बिजली के बिल से और बच्चों की स्कूल फीस से। वहाँ फौजी को ‘हथियार’ चाहिए, यहाँ बुनकर को ‘बाज़ार’ चाहिए। पर बड़े नेताओं को सिर्फ ‘नक्शा’ बदलना है, किसी को ‘नसीब’ बदलने की फिक्र नहीं है।”
4. काका का ‘शांति’ मंत्र
चलते चलते काका ने बुनकर भाई के कंधे पर हाथ रखा और मुझसे बोले— “बबुआ, दुआ करो कि इज़राइल का वो फौजी घर लौट आए और अपनी दुकान खोले, ताकि वो फिर से अपनी बीवी के लिए बनारसी साड़ी का ऑर्डर दे सके। सरकार भी इनका हाल हवाल लेकर उनके रोज़ी रोटी की व्यवस्था करे और बाज़ार मुहैया करवाए, वासे तो जब तक वहाँ ‘बारूद’ की गंध रहेगी, यहाँ ‘रेशम’ की चमक वापस नहीं आएगी।”
📊 वैश्विक जंग बनाम स्थानीय पेट: एक तुलना (Global War vs. Local Stomach)
| पहलू | इज़राइल के रिज़र्व सैनिक | बनारस के बुनकर |
| मुख्य समस्या | शारीरिक और मानसिक थकावट | आर्थिक मंदी और काम की कमी |
| पारिवारिक स्थिति | महीनो से घर से दूर | घर में रहकर भी ‘खाली हाथ’ |
| मांग | युद्धविराम और घर वापसी | कच्चा माल और साड़ी की मांग |
| भविष्य | अनिश्चितता का डर | भुखमरी और कर्ज का बोझ |

प्रधान सम्पादक
📌 कासे कहू…?
वाराणसी से लेकर तेल अवीव तक, इंसानियत एक ही जैसे दर्द से गुज़र रही है। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, वह बनारस की गलियों में ‘मंदी’ बनकर भी हमला करता है। काका के साथ हमारी ‘मोरबतियाँ’ आज उन सभी के लिए एक शमा जलाने की कोशिश है जो इस युद्ध की बेड़ियों में अनचाहे ही जकड़ लिए गए हैं।











