यूपी काजेल छात्र हत्याकांड पर तारिक आज़मी की मोरबतीयाँ: जियो गुरु.. तन पर भले न हो लत्ता, मगर पिस्तौल रखे रहो अलबत्ता….?, गजब आत्म निर्भरता है भाई
व्यंग्य: तारिक आज़मी की 'मोरबतीयाँ'— यूपी कॉलेज छात्र हत्याकांड, काका-काकी की नोकझोंक और 'आत्मनिर्भर' पिस्तौल का खेल। जब बाप मजदूर हो और बेटा 'सनातनी गौरव' में पिस्टल तान दे, तो समझिये विकास चरम पर है। PNN24 की विशेष पेशकश।

तारिक आज़मी
वैसे अरसा गुज़र गया अपने काका से हमको बात किये हुवे। वैसे तो बाते हुवा करती है। मगर पुरे रोज़े भर काका और काकी के बीच नोकझोक रुकी हुई थी। एक बार मुझसे मेरे छोटे भाई ने पूछ डाला कि ‘रमजान भर काका और काकी की नोक झोक नहीं हुई।’ अब मुझे क्या पता था कि काका और काकी दोनों के कान हम दोनों की बातो पर लगे हुवे थे। तो मेरे मुह से निकल गया कि ‘रमजान में शैतान कैद रहता है’। कुटिल मुस्कान के साथ मेरे इस बात को सुनकर काकी तो हंसी मगर काका के तेवर चढ़ गये।

आखिर मैंने ही इस भारी ज़िम्मेदारी का बोझ अपने नाज़ुक कंधे पर उठाने की सोची और काकी से बीच का रास्ता बताने को कहा। डरे सहमे काका ने कहा कि ‘ठीक है बबुआ तुम कहोगे तो हम मान जायेगे।’ मगर मुझको पता था कि काका इस वक्त वेनेजुएला की हुक्मरानी भी काकी को देने के लिए तैयार बैठे है। आखिर काकी से मैंने ‘सीज फायर का रास्ता पूछा तो उन्होंने तपाक से अपना मोबाइल बार कोड खोल कर आगे बढ़ाते हुवे कहा कि बस एक सूट बनारसी पसंद आया है। ज्यादा महंगा नहीं है सिर्फ 5 हज़ार का है।‘काका के सामने समस्या के समाधान का एक ही उपाय था कि 5 हज़ार दे और काकी से सुलह करे। अन्यथा काका तो बंकर की तलाश करने में जुटे नज़र आते।

आज सुबह काका बड़ा उदास दिखाई दिए तो हमने कारण पूछ लिया कि काका बताओ का हुआ। तो उन्होंने यूपी कालेज छात्र हत्या की बात छेड़ दिया और कहा कि अपनी सोच समझ से बताओ आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस उम्र में बच्चे अपना भविष्य सवारते है उसी उम्र में एक बच्चा स्वर्ग सिधार गया और दूसरा जेल प्रस्थान कर गया। आखिर तुम्हारा अपना नजरिया क्या है।काफी सोच कर मैंने जो उनको समझाया वह आपको भी बताता हु। मगर बराए मेहरबानी आप धार्मिक चश्मे से इसको नहीं पढियेगा।
दरअसल यूपी कॉलेज वाले मामले में जो भाई साहब सूर्य प्रताप सिंह स्वर्गवासी हुए वे सीनियर और मनबढ़ थे, ऐसा कालेज में चर्चा है। अब मंजीत की भी मान लेते है कि जब तब वह मनजीत सिंह चौहान की रैगिंग ले लिया करते थे- मुर्गा बनाते थे, पीट पाट देते थे। इस मनबढी का हाल तब था जब उनके पिता ड्राइवर और माँ दाई है, लेकिन भाई साहब मनबढ़ थे। मंजीत डेलीगेसी का था और वो भी मनबढ़ था। यहाँ भी एक बड़ा कमाल ये था कि उनके पिता राजगीर माँ गृहणी है। मगर ये भी मनबढ़ थे। खैर, फिलहाल रामराज है तो हर सनातनी को और कुछ न सही कम से कम बेरोजगार और टनाटन सनातनी और मनबढ़ तो बना ही दिया है।
हुआ ये कि घटना वाले दिन फिर सूर्य प्रताप सिंह अपने मित्रों के साथ मंजीत और दूसरे नामजद आरोपी अनुज सिंह को पीट दिए। मगर इस बार बात ज़्यादा बढ़ गई। मामला प्रिंसिपल तक पहुँचा और सुलह समझौता की बात तो हुई मगर मंजीत ठहरे सनातनी व्यक्ति भला सदियों के अपमान का बदला सिर्फ़ मुगलों से थोड़े ही लेना सीखा था। बदला लेना सीखा था तो मुग़ल के बाद युगल से भी लिया जा सकता है। तो बाहर निकले, घर गए, पिस्टल निकाले जो दो साल पहले एक सहपाठी से ही खरीदे थे।

- पहला विकास है आत्म निर्भरता: पिस्टल आदि खरीदने कहीं बाहर नहीं जाना है- कॉलेज के अंदर ही बिक रही है, शायद बन भी रही हो। ·
- दूसरा विकास है सनातन गौरव: बाप चाहे ड्राइवर हो या फिर चाहे राजगीर माने दोनों मजदूर ही सही सनातन गौरव जाग उठा है। किसी ने अपमान किया तो सरकार, प्रशासन और कानून व्यवस्था गए तेल लेने। तेल मिल वैसे वो भी नहीं पा रहा है पहले ट्रंप बेइज्जत करके रूस से ख़रीदना बंद करवाया था और अब ईरान मुश्किल से आने दे रहा। फिर भी मुहावरे में तीनों गए तेल लेने गये। सनातन गौरव जाग उठा है और किसी अपमान पर ठोंक देने से कम पर नहीं रुकेगा। नारा सड़क पर लगता देखा है न ‘गोली मारो सा*** को’ ·
- तीसरा विकास है सनातन में चरम स्तर पर वफ़ादारी: प्रत्यक्षदर्शी बता रहे कि मारने वालों में मंजीत के मित्र अनुज सिंह भी शामिल थे, जो फिलहाल फ़रार हैं। लेकिन मनजीत मित्र धर्म निभा रहे हैं, सीना ठोंक के कह रहे हैं कि हम अकेले मारे हैं- अनुज वहाँ था ही नहीं। इससे मन में मंजीत के लिए सम्मान बढ़ गया है।
काका बोल उठे तो ‘अब क्या..?’ मैंने कहा अब बस अनुज सिंह क्षत्रिय निकल जाएं तो सनातन गौरव चरम पर पहुँच जाये। अभी मरहूम राजपूत निकल गया है और हत्यारा ज़्यादा संभावना है कि नोनी यानि ओबीसी है। यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ का ‘बँटेंगे तो, कटेंगे वाला भय साफ़ है।’ पर अगर अनुज राजपूत निकल गए तो एक हैं। तो मृतक को जाने दीजिए बाक़ी सब सेफ़ हैं ये तय हो जाएगा।

प्रधान सम्पादक
इतना सुनना था कि काका का मुँह कड़वाहट से भर गया। उन्होंने गुस्से में फ्रिज खोला, सिवई की कटोरी निकाली और मुझे धमकी दी— “बबुआ, ई सिवई का राज फाश हुआ, तो 5 हजार का सूट तुमको दिलाना पड़ेगा।” मैं चुपचाप बाथरूम की ओर निकल लिया। 5 हजार की ‘लंका’ लगने से बेहतर है कि शांति से सिवई खाने दी जाए। आखिर ‘विकास’ का स्वाद चखना सबके बस की बात कहाँ!
📊 विश्लेषण: यूपी कॉलेज की ‘नई शिक्षा नीति’ एक नज़र में (Satirical Breakdown)
| विकास का पैमाना | ज़मीनी हकीकत | परिणाम |
| स्टुडेंट प्रोफाइल | पिता मजदूर/राजगीर | हाथ में अवैध असलहा |
| सुरक्षा तंत्र | एंटी-रैगिंग सेल | ‘सुलह-समझौता’ का नाकाम खेल |
| हथियार उपलब्धता | कॉलेज कैम्पस | 2 साल पहले सहपाठी से खरीद |
| कानून का खौफ | ज़ीरो | ‘ठोंक देने’ की मानसिकता |











