डिजिटल मीडिया (पोर्टल) पत्रकारों के सम्बन्ध में वायरल होती पोस्ट है की जाने हकीकत, कर्नल राजवर्धन सिंह राठौर के प्रेस कांफ्रेंस का नाम बता कर चल रही है फर्जी पोस्ट

तारिक आज़मी

विगत तीन चार दिन से कई सोशल मीडिया के व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में एक पोस्ट वायरल हो रही है। पोस्ट में बताया जा रहा है कि “सुचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री कर्नल राजवर्धन सिंह राठौर ने पोर्टल को फर्जी कहा है।” वैसे भी व्हाट्सएप पर कौवा कान ले गया वाली कहावत अक्सर ही चरितार्थ होती रहती है। इस पोस्ट के साथ भी यही कुछ हुआ। पत्रकारों की निष्पक्षता से खुन्नस खाए लोगो ने इस पोस्ट को जमकर वायरल करना शुरू कर दिया। इसमें आग में घी का काम किया वाराणसी जिला सुचना कार्यालय में कार्यरत एक कर्मचारी की फेसबुक पोस्ट ने। फेस बुक पर सज्जन ने इस पोस्ट को कापी पेस्ट कर डाला।

जिला सुचना कार्यालय के कार्यरत कर्मचारी के फेसबुक पर पड़ी इस पोस्ट को देख कर कई उतावले पन के शिकार और अल्प ज्ञान रखे हुवे लोगो ने इस पोस्ट को तुरंत कापी किया और खुद का समाचार बना डाला। दरअसल जानकारी भले न हो, बीच में कूदने से खुद की वाहवाही लुटने के चक्कर में पोस्ट को उठा कर अपने पोर्टल और अन्य माध्यमो से प्रकाशित करके वायरल भी करने लगे। इस क्रम में जब हमारी नज़र इस “फेक न्यूज़” पर पड़ी तो हमने इसकी पुष्टि करना चाहा। जिसपर जानकारी मिली कि जिला सुचना कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी द्वारा इस पोस्ट को फेस बूक पर डाला गया है जिसके वजह से इस पोस्ट को सत्य और पत्थर की लकीर मान लिया गया।

अब जिला सुचना कार्यालय के कर्मचारी का नाम आये और उसकी सत्यता की पुष्टि करना पड़े तो ज़ाहिर है बेमतलब की बात होगी। वैसे कर्मचारी महोदय के सम्बन्ध में क्या कहा जाए कि जिस मंत्रालय के अधीन उनका कार्यालय आता है उस मंत्रालय के मंत्री का नाम तक वो नहीं जानते है, ये जान कर अचम्भा हुआ। जब हमने सुचना विभाग के कर्मचारी महोदय के फेसबुक वाल पर देखा तो वह पोस्ट उन्होंने दो दिनों पहले ही डाल रखा था। कई उनकी जयकारा कहने वाले लोग जयकारा कर रहे थे। तो एक वरिष्ठ पत्रकार ने उन पर तंज़ भी कसते हुवे एक पोस्ट डाली थी। जिसके बाद जब हमारी आपत्ति दर्ज हुई कमेन्ट बाक्स में तो उन्होंने अपनी पोस्ट डिलीट कर डाली। मगर उनकी पोस्ट को कापी पेस्ट करते हुवे कई लोग ज्ञाता तब तक बन चुके थे।

बहरहाल, आइये प्रकरण में आपको हकीकत से रूबरू करवाते है। हकीकत में राज्य मंत्री कर्नल राजवर्धन सिंह राठौर वर्त्तमान में सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सम्बंधित है ही नहीं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता कर्नल राजवर्धन सिह राठौर के पास सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय का कोई भी प्रभार नही है। 14 मई, 2018 से 25 मई, 2019 तक वह राज्य मंत्री सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय पद पर थे। इसके बाद वर्त्तमान में वह सदस्य, परामर्शदात्री समिति सड़क परिवहन एवं राज्य मार्ग मंत्रालय है। अब जो लोग इस पोस्ट को वायरल कर रहे है तो पोस्ट से सम्बन्धित सत्य से पहले आपको अवगत करवा दे।दरअसल वर्ष 2017-18 में एक प्रेस कांफ्रेंस में कर्नल तत्कालीन केंदीय राज्य मंत्री कर्नल राजवर्धन सिंह राठौर के द्वारा एक प्रेस कांफ्रेस में पोर्टल पर पूछे गये सवाल के जवाब में उन्होंने पोर्टल हेतु कोई नियमावली सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वार नही घोषित किये जाने की बात बताई थी। जिसके बाद से यह पोस्ट कुछ दिन टहल घूम रही थी। इस पोस्ट के लिए तत्कालीन केंद्रीय राज्यमंत्री सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा इन फर्जी बातो का खंडन भी किया गया था। इसके बाद भी ये पोस्ट कई बार ऐसे ही कापी पेस्ट की तरह घुमती रही। बात आई और गई खत्म हो गई थी।बीच बीच में कभी कभी ये पोस्ट व्हाट्सएप पोस्ट के माध्यम से घूम टहल लेती थी और अक्सर ये पोस्ट उनके द्वारा घुमती फिरती थी जिनको पत्रकारिता से केवल मतलब गाडी को चेकिंग से बचाना होता था। मगर इस बार ये पोस्ट थोडा ज्यादा ही टहल ली है।

पोर्टल (डिजिटल मीडिया) के सम्बन्ध में जाने हकीकत

पहले आपको बताते चले कि सुचना एवं प्रसारण मंत्रालय से हर एक प्रेस मीट का प्रेस रिलीज़ जारी होता है। जो मंत्रालय के वेब साईट पर आती है। पिछली प्रेस मीट 15 मार्च को मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रेस कांफ्रेस में मंत्री प्रकाश जावेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “कई संस्थाएं हैं जो केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ही काम करती है उनको भी नियमो का पालन करना होगा।“ यहाँ इस डिजिटल प्लेटफार्म का तात्पर्य पोर्टल और युट्यूबबर्स से है जो आरएनआई अथवा टीवी न्यूज़ से सम्बन्धित नही है। इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद अभी तक याने समाचार लिखे जाने तक कोई अन्य प्रेस कांफ्रेस आयोजित ही नही हुई है।

जाने ये भी हकीकत

डिजिटल मीडिया से सम्बंधित काफी लोगो ने ये प्रयास किया था कि डिजिटल मीडिया हेतु भी नियमावली होनी चाहिए। हमारे द्वारा भी मंत्रालय में इस सम्बन्ध में मांग किया गया था। सरकार ने अब डिजिटल मीडिया हेतु नियमो को लागू कर दिया है।

डिजिटल मीडिया के लिए मंत्रालय में एक अलग विभाग भी बन गया है। डिजिटल मीडिया इथिक्स कोड (डिजिटल मीडिया नियमावली) लागू किया है। जिसको भी इस इथिक्स कोड को समझने में दिक्कत हो वह इथिक्स कोड के लिए सभी शकाओ और सवालो का जवाब मंत्रालय की वेब साईट पर पा सकते है। क्षितिज अग्रवाल को सहायक निदेशक (डिजिटल मीडिया) नियुक्त किया गया है। 9-11-2020 को डिजिटल मीडिया के सम्बन्ध में अधिसूचना जारी हुई है। इसको भी पढ़ा जा सकता है। इस अधिसूचना के बाद तीन भाग में डिजिटल मीडिया को तकसीम करके अब जानकारी इकठ्ठा किया जा रहा है। जिसमे पहले परिशिष्ट में वह डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म जो आरएनआई अथवा अन्य पुराने नियमो के तहत पंजीकृत है। जैसे अख़बार और टीवी चैनल्स के पोर्टल। दुसरे परिशिष्ट में ऐसे पोर्टल्स जो इन माध्यमो से संचालित नही है। और तीसरे में ओटीपी प्लेटफार्म है।

क्यों है कुछ लोगो को पेट में दर्द ?

असल में हकीकत इसकी ये है कि केवल कुछ लोगो को पोर्टल वालो से पेट में दर्द काफी रहता है। इसकी वजह समझी जा सकती है। देखे, मीडिया अभी जिस रूप में आपके सामने है वह काफी अब परिपक्व हो चूका है। वौइस्, प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर समाचारों का समय निश्चित रहता है। डिजिटल मीडिया वाला मौके से ही खबर उठा कर बना कर लगा देता है। इससे खबर के बासी हो होने का डर बन जात है। दुसरे पहले खबरों को दबा दिया जाता था। ये एक कडवी सच्चाई बता रहा हु। खबरे दब जाती थी पहले, मगर अब स्थिति कुछ ऐसी है कि दस पत्रकार मिलकर खबर दबाने का प्रयास भले कर ले, मगर डर रहता है कि कब कौन मामले को वायरल न कर डाले और मामला खुल न जाए। अब शायद लोगो के पेट में दर्द का कारण आप समझ सकते है। कल तक जिसका वर्चस्व था आज वह वर्चस्व खतरे में सिर्फ पोर्टल के वजह से पड़ चूका है। डिजिटल मीडिया और पोर्टल के खिलाफ चलती ये खबरे पूरी तरह भ्रामक और कोरी अफवाह साबित हुई है।

नोट – नीले शब्दों में लिए लाइन पर आप क्लिक करके सरकारी घोषणाओं को आप पढ़ सकते है और लेख का आप साक्ष्य पा सकते है।

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