माहे-रमज़ान: रहमतों के नुज़ूल और इबादत का मुकद्दस पैगाम; मस्जिदों में बढ़ी रौनक, बाज़ारों में इस्तकबाल की तैयारी
माहे-रमज़ान: रहमतों का नुज़ूल और इबादत का पैगाम। शाबान की रुखसती के बाद शुरू होने वाला है इस्लाम का सबसे मुकद्दस महीना। रोज़ा, नमाज़ और ज़कात के जरिए आखिरत संवारने की तैयारी। पढ़ें PNN24 की विशेष रिपोर्ट।

फारुख हुसैन
हर साल की तरह इस साल भी माह-ए-शाबान के रुख़सत होने के साथ ही इस्लाम का सबसे मुक़द्दस (पवित्र) महीना रमज़ान-उल-मुबारक शुरू होने वाला है। इस मुबारक महीने की आमद की खबर मात्र से ही हर मोमिन के चेहरे पर खुशी की लहर है। रमज़ान हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना है, जिसे तमाम महीनों का ‘सय्यद’ (सरदार) कहा गया है।
रोज़ा: सिर्फ भूखा रहना नहीं, बल्कि नफ्स पर काबू है ‘रोज़ा’ अरबी शब्द ‘सौम’ का फारसी अनुवाद है, जिसका अर्थ है ‘रुक जाना’। रोज़ा केवल खाने-पीने को छोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह हर उस काम से खुद को रोकने की इबादत है जो अनैतिक या अधर्म (ला-दीनी) है। रमज़ान सिखाता है कि हम अपनी आँखों, कान और ज़बान का भी रोज़ा रखें— न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही किसी की ग़ीबत (बुराई) करें।
बाज़ारों में रौनक और इबादत का जज़्बा रमज़ान शुरू होने से पहले ही बाज़ारों में खजूर, सेवइयां और लच्छों की मांग बढ़ गई है। सहरी और इफ्तार के एहतेमाम के लिए लोग खरीदारी में मशगूल हैं। मस्जिदों को साफ-सुथरा और रोशन किया जा रहा है ताकि तरावीह और नमाजों के लिए मोमिनों का इस्तकबाल किया जा सके।
🎙️ जनमानस की आवाज़: क्या कहते हैं रोज़ेदार?




🌙 मुफ्ती का पैगाम

“इबादत में खुलूस (ईमानदारी) लाएं। केवल रस्म अदायगी के लिए रोज़ा न रखें, बल्कि खुद को अल्लाह की रज़ा के लिए वक़्फ़ कर दें। ज़बान और व्यवहार को पाक-साफ रखें।”











